Sunday, 3 January 2016

कम्युनिटी इमर्शन अपने फेलो का............................

कल ही अपने फेलोज, कम्युनिटी इमर्शन के लिए गए है. काफी अलग-अलग सोच उनकी निकलकर आई थी. किसी को घर मिला था तो किसी को नही. कोई जान रहा था की कम्युनिटी में जाकर क्या करेंगे तो किसीको को पता ही नही था की क्या करना है? वे इस अनुभव को तो जीना चाहते है. वे जीना चाहते है उन अनुभवो को जो अब तक उन्होंने नही जिया था. अपने खुद के family की भी थोडी बहुत चिंता थी की घरवालों को बताया जाया जाए या नही? इन तमाम सवालो को वे झेल रहे थे. 

लेकिन इतना तो जान रही थी कि वो इस प्रक्रिया से सीखना चाहते है, आगे बढ़ना चाहते है. आज उनका दुसरा दिन है कम्युनिटी में. मै नही जानती की वो लोग अब इस वक़्त क्या कर रहे होगे? क्या उनको वहा का खाना, बिस्तर, लोग, वहा की एक अलग ही सुगंध/दुर्गंध पसंद आयी होगी या नही? इतना तो जानती हु वो बड़े ही ख़ुशी से इस नये प्रोसेस के लिए चले गए है. उन्हें जाने से पहले जब उनको में टिका लगा रही थी और कुछ बेस्ट वीशेस साझा किया तो अच्छा लग रहा था उन्हे और मुझे भी. मानो कि वे किसी बडे लक्ष्य के प्राप्ती के लिये जा रहे हो. 

वे जानते है की वहा पर उनके साथ क्या हो सकता है तो कुछ लोग नही जानते थे की क्या होगा? वे बस उस अहसास में रहना चाहते थे. लेकिन मै जानती हु यह अनुभव उनके जीवन का बड़ा ही अहम हिस्सा होगा. अपनी एक फेलो कह रही थी की, "जब वो दस साल के बाद इस मुंबई में आएगी तो उसके लिए दुसरे घर के दरवाजे हमेशा के लिए खुले रहेंगे". इस बात से वो काफी खुश है. दूसरा फेलो बता रहा था की, "मुझे एक तमिल परिवार ने मना कर दिया है. उन लोगो के पास जगह तो है लेकिन कोई मुझे रखने के लिए नही मना कर रहा है. देखते है आज जाकर की मुझे घर कहा पर मिलेगा". अपना दूसरा फेलो बता रहा है की, "घर तो मुझे कुछ दिनों के बाद मिलने वाला तब तक स्कूल में रह लूंगा, और खाना एक ताई के पास मिल जाएगा". एक फेलो बता रहा था की, उसे तो पुरे तीन घर मिले है, इस प्रोसेस के लिए जाने से पहले ही उसे घर से खाना दोपहर का मिलने लगा है". यह सुनकर काफी अच्छा लगा कि, वो जाने के लिये तो तैयार तो थे हि लेकीन उसके साथ-साथ वे उन तमाम विचारो, जज्बातो को साथ ले जा रहे थे जो उन्हे community मी रहने के लिये मद्द करेगा. 

दुसरी तरफ जाने से पहले वे उन्हे घर और खाने कि चिंता उनके बातो से आ रही थी. लेकीन इस प्रक्रिया कि वजह से उनके लिये कितनी महत्त्वपूर्ण बात है. इतनी गंभीरता उनके बातो से निकलकर आ रही होगी. कहते है कि घर, कपडा, मकान यह काफी मुलभूत बात है एक इन्सान के जीवन में जो इनसे पता चल रहा था. 

एक फेलो तो बता रही थी की, उसका दोस्त उसे मना कर रहा था इस प्रोसेस में हिस्सा लेने के लिए. कुछ तो घरवालों को बताने के लिए हिचकिचा रहे है. कुछ फेलो ने सोच ही लिया की कोई भी पैसे या कम से कम पैसे ले जानेवाला है तो कोई कह रहा था, की फोन-इन्टरनेट को इस्तेमाल नही करेगा. इन बातो को सुनकर वे काफी गंभीर लगे इस प्रक्रिया को जानने और समझने के लिये. 

कम्युनिटी इमर्शन यह एक ऐसी प्रोसेस थी अपने फेलो के लिये जहा पार उन्हे बहुत कुछ अनुभव करना था, वे जानना चाह रहे थे जीवन के तमाम अनुभव लोगो के मुह्बोली बातो से, वहा पर वे बहुत सारे आयडीयाज को करके देखना चाह रहे थे. उनके जीवन को वे फिर एक बार समझना चाह रहे थे. 

Thursday, 17 December 2015

CHILD LINE IN MY REALITY


कल एक family से मुलाक़ात हुई जो रैल्वे स्टेशन के stair case के उपर बैठी थी. लोग उस family को, आते जाते खाना-पैसे दे रहे थे. मैंने देखा तो उन्हें कुछ फल दिए, और कुछ देर के बाद मैंने चाइल्ड line को फोन किया तो उनके वालंटियर्स आ गए. उस औरत से बात की. और यह निर्णय लिया गया की, किसी एक बच्चे के लिए अस्पताल जाना जरुरी था. लेकिन उस बच्चे के पिताजी से माँ को परमिशन लेनी जरुरी थी. वे तो मना करने लगे थे की, बच्चे को अस्पताल नही लेना जाना (क्योंकि उनका रोजमर्रा कमाई के उपर असर हो सकता है, जब की सच्चाई थी). लेकिन उस बच्ची के पिताजी के थोड़ा सा बताना ही पड़ा, उसके साथ साथ रास्ते पर चलनेवाले कुछ लोग पिताजी को समझा भी रहे थे उन्हें. तो वो मान गए. उन्हें child लाइन के जरिये नायर हॉस्पिटल के स्टाफ ने उस बच्चे की ट्रीटमेंट शुरू की. अब उस बच्चे को चार हफ्ता एडमिट करने के लिए कहा गया है.

इस बच्चे के बारे में कहा जाए तो यह बच्चा एकदम से, कुपाषित थी. उसकी उम्र तो करीबन 3 साल की है. लेकिन दिखने के लिए जैसे की, 6-महीने का बच्चा हो. उसका वजन किया तो वह सात किलो और तीनसो ग्राम निकला. जब की तीन साल के बच्चे का वजन 15-20 के करीब होना चाहिए. उस बच्चे को जब मैंने गोद में उठाया था तो उसके केवल हड्डिया मुझे छूह रही थी. तो पता चल रहा था की इस बच्चे की हालात कितनी क्रिटिकल थी. 

इन सब काम में child लाइन के स्टाफ काफी विश्वसनीय मुझे लगे. अब तक केवल उनके बारे में सूना था, लेकिन उनका काम प्रत्यक्ष रूप से रात के बारा बजे तक मुझे देखने के लिए मिला. वे लोग काफी कैरिंग दिखे, उनकी लगातार इस family के साथ काम चल रहा था, तो बच्चे को रस्ते से उठाकर से लेकर अस्पताल में भर्ती होने तक और उसके आगे भी इस चार हफ्ते में उनकी सारे जरुरतो का ख्याल करने वाले है.

उसमे भी एक वालंटियर Childline की, यह कह रही थी की, वो केवल बच्चो के लिए कम करते है लेकिन माँ और पिताजी का खाने की जिम्मेदारी वो अपने घर से करेगी. यह सुनकर बहुत अच्छा लगा. यह मेन हीरो तो इस ऐसे जगह पर भी है. उस पुरे स्टाफ ने काफी रात के 8:30 से लेकर 12 बजे तक वो इस family के साथ रुके थे. उनके खाने, बच्चे के दवाइयों का इन्तेजाम उन्होंने उसी वक्त किया. कुछ एक वालंटियर का निकलने का समय हो गया था, तब पर भी उन्होंने अपना पूरा वक्त बच्चे के एडमिशन होने तक रुके रहे.


Lots of thanks to this Child line volunteer and the people who were helping this family for the treatment of the child. 
आज तो एक कमाल की बात हुई. मेरे ऑफिस के colleague ने मुझे विक्रोली के हाईवे पर छोड़ने के बाद हुआ ऐसे की, मै स्टेशन की और चलने लगी. मुझे दो औरते ठहराकर पूछा की तुम मराठी जानती हो क्या? मैंने कहा की हां बताइये. “उम्होने कहा की उन्हें बेहद भूख लगी है. खाने के लिए पैसे नही है, आज या कल से मुंबई में आये है. उनके बच्चो को मिलने के लिए जो अब पेंटिंग का काम करते है. लेकिन वे पुणे चले गए है. अब पैसे नही है. तो अब मार्गशीष महिना चल रहा है, उपवास है, तुम कुछ खाने के लिए दोगी तो तुम्हे बहुत पुण्य लगेगा. मैंने कहा की चलिए मेरे साथ रेस्टोरेंट में मै आपको खाना खिलाती हु. पर उन्होंने मना किया क्योंकि उनके पास अब गाव (अकोला जिल्हे में शेगाव में) जाने के लिए भी पैसे नही है. तो फिर मैंने उनसे पूछा की खाने के लिए होटल जायेंगे की मै आपको पैसे दू घर जाने के लिए. उन्होंने कहा पैसे दो, फिर मैंने कहा उन्हें की मै आपको 100 रुपये दूंगी. वो राजी हो गए लेकिन और भी पैसे मांग रहे थे, फिर मैंने कहा की इतने ही पैसे है. फिर उन्होंने कहा की ठीक है. रूपये लेने के बाद पूछा मेरे बारे में तो मैंने अपने बारे में कहने की शुरुवात की, “वैसे तो काम ठाने के सरकारी स्कूल में करती हु. मुंबई में रहती हु अपने परिवार के साथ, पुणे के जुन्नर तहसील में आलेफाटा गाव है. वे मेरा गाव नही जानते थे तो मैंने कहा की, मेरे गाव में संत ज्ञानेश्वर ने रेडा से कुछ वेद बुलवाकर लिए थे, तो उसी गाव से मै हु. उसके बाद वे काफी खुश भी हुए. और उन्होंने मुझे डेढ़ सारा आशीर्वाद दिया ऐसे कहकर की, मेरा सबकुछ अच्छा हो जाएगा. कुछ मीठे बोल भी सुनाये. इतना मस्त लगा मुझे उन्हें सुनकर. और फिर मैंने कहा फिर मिलते है शेगाव में. वो मुझे कह रहे थे की, मै उनके लिए संत मुक्ताई हु. न जाने वो ऐसे क्यों कह रही थी. जितना पढ़ा है संत मुक्ताई के बारे में तो वो संत ज्ञानेश्वर की बहन है. उन्होंने काफी श्क्लोक लिखे है. किसी चांगदेव नाम के व्यक्ति की भी गुरु थी.

तब लगता है की, एक भाषा लोगो के जीवन में कितना बड़ा कार्य करवाती है किसी की और से. अगर उस वक्त शायद मराठी ना पता होती तो शायद इतनी लम्बी बातचीत नही होती मेरे उन औरतो के साथ. कैसे एक भाषा अद्भुत तरीके से जीवन में काम करती है.


उसी में से सोच रही हु, भाषा सिखना इतनी नैसर्गिक प्रक्रिया है. और उसमे आजकल भाषा सिखने के लिए मार्किट में पैसे गिने जाती है. नैसर्गिक प्रक्रिया कीतनी मशीन की तरह हो गई है. छोडो इतना सोचोगे तो काम करना मेरे लिए मुश्किल है. जो अब मेरे हाथ में है उसे तो कर ही सकते है.   

Friday, 6 November 2015

बाळ आणि ते जोडप.....................


बाळ कोणाला असायला हवे की नव्हे अस समाज ठरवतो आणि काही स्वताच्या जीवनातील कल्पना मानव साकारीत असतो. म्हणून त्यानुसार एका बाळाचा जन्म होतो. लग्न झाल्यावर बऱ्याच स्त्रियांना वाटत की मूल असायला हव. आणि नाही झाले तर सुरु होतो अनेक डॉक्टरांच्या  फेऱ्या आणि इथेही नाही झाले तर आहे आपले दैवत ज्यांच्या कड़े गेल्यावर मनातील अनेक विचार-भावनांची इच्छापूर्ती होईल अशी आशा बाळगतात. कधीतरी चमत्कार होतो तर कधी दैवत बदलत असतात. 

जेव्हा मी childlessness ह्या पुस्त्केची प्रस्तावना वाचायला घेतली तिथे असा प्रश्न आला की महिला किंवा एकाध जोडप किंवा त्या परिवारातील लोक असे का नाही म्हणत की आह्माला बाळाला जन्म देण्याची काय गरज? अस कोणी स्वताला विचारित नाही का? एका बाजुला ती एक शारीरिक/मानसिक/सामाजिक गरज होऊन बसते तर दूसरीकड़े आपणच स्वताला प्रश्न विचारायला हवा वास्तविकतेला धरून की खरच बाळची गरज आहे का?  

अनेक वेळा महिलांच्या अनुभवातून ऐकले की, लग्न झाल्यानंतर महिलेला वाटत की आता बाळाची चाहुल लागायला हवी. ते कशापायी होते. तर त्याची अनेक कारण आहेत, एक तर स्वतापासून एक बाळ असयाला हवय ज्याला म्हणू शकतो की लैगिक/भावनिक गरज आहे. दूसरी कड़े समाजाने (संकुचित वुत्तीच्या लोकांनी) लग्न झाल्यावर वर्षभरात पाळणा हलायला हवाय असा स्वताच्या अपेक्षेचे दार त्या जोड़प्यास खुले करून देतात.

एक गोष्टींचा विचार करीत होते की, पुरुषांना असे कधी वाटते का त्यांना बाळ असायला हवे? ते कधी अस म्हणतात का आता लग्न झाले मला बाळ हवे. एक तर ऐकले होते की बाळ हवय पण तो सुद्धा मुलगा कारण आडनाव/बापाचा वारसा पुढे नेण्यासाठी बाळ(मुलगा) हवाय.


एकंदरीत वाटते की, ज्याचा त्याचा प्रश्न, त्यांच्या गरजेनुसार ठरवावा की, मूल हवे की नको. हव असेल तर त्याची पूर्वतैयारी करायला हवी. जेणेकरून त्या व्यक्तीची जडण-घड़ण योग्य रित्या करता येईल आणि त्याचबरोबर पोषणकर्त्याचाही विकास त्या बाळासंगे होईल.   

Tuesday, 3 November 2015

संशयी वृत्ती त्यांच्या दोघामधे.......................


पती-पत्नी मधील संशय पाहून असे वाटते की, ते फक्त घाबरलेले आहे एकमेकांपासून जर दूर झालो तर. किंवा ते असे मानून असतात की, जर माझा नवरा/बायको दूसरी कड़े गेला तर, माझे काय होइल. ह्या विचारांनी त्याना ग्रासून ठेवलेले असते. अशा वेळेस ना ते स्वता जगतात की आपल्या पाटर्नर ला जगुन देत असतात. सतत भयाच सावट त्यांच्या आयुष्यात वेगवेळया संशयाने येरझारा घालित असतात.
ज्या नात्यात प्रेम, काळजी फुलायला हवी तेथे फक्त नी फक्त भितिपोती राग, द्वेष निर्माण झालेला असतो. तेथे ते कधीही खुश राहू शकत नाही. तेथे भावनिक रित्या ते जोड़प अगदी पिळन गेलेले असते. स्त्री/पुरुषांच्या प्रत्येक शब्द, वेशभूषा, नाती-गोती ह्या प्रत्येक गोष्टीत संशयाचा कल्लोळ मांडलेला असतो.

पीड़ित व्यक्ती आपल्या आवडी-निवडी कुठेही दर्शावु शकत नही. स्वताचा स्वतंत्र ते हिरावून बसलेले असतात. असे वाटते की जर संशियित व्यक्तीला कळले तर काय अवस्था होईल. वाचा तर अगदी त्यांची तर अगदी बंदच झालेली असते.

एकदा ट्रेन मधे बसले असताना, समोरून एका मुलीला फोन येत असतो. त्यावेळस फोन येतो तिच्या प्रियकराचा फोन उचलते अन त्याला बोलायला सुरुवात करते की, “तुला माझा पासवर्ड कशाला हवाय. ते घेउन तो काय करशील, मी तुला नाही देणार. पर्सनल गोष्टी पर्सनलच ठेवाव्या” पती म्हणतो की, “पती-पत्नी मधे पर्सनल असे काहीही नसते, त्यांच्या मधे सगळया गोष्टी उघड असतात. त्यात मेल मधे लपवीण्यासारखे काय आहे?” ह्या संभाषनातुन एकच वाटले की, मुलीने तर कधीच आपल्या पतीकडून कोणत्याही गोष्टीचा पासवर्ड नाही मागितला. दूसरी गोष्ट की, सगळया गोष्टीची माहिती त्या पतीला माहीत असायला हवी अशी सक्ती पती पत्नीला करतो. तीसरी गोष्ट अशी वाटली की, स्वताचे व्यक्तिमत्त्व नसलेल्या पती, आणि पत्नीचे हि व्यक्तिमत्त्व नाहीसे करायला निघालेला तो पती होता. तो फक्त आपल्याच जाळयात अडकवू पाहत होता तिच्या पत्नीला. तिचा रोज कोणाशी सवांद होतो, काय होतो, कसा होता ह्या सगळ्या गोष्टीचे रिपोर्टिंग त्याला हवे असते.

एकदा तर एका मुलीने तिचे अनुभव असे सांगितले की, तीला तिच्या एडमिन डिपार्टमेंट मधून एक फॉर्मल मेल आला, त्या मेल ची सुरुवात “डिअर” अशी होती त्यामुले तिच्या बॉयफ्रेंड ने तिचे अकाउंट उघडून, असे मेल केले की, “please use Mrs Sumita rather than Dear Sumita”.  असा रिप्लाई पाहून त्या मूलिस धक्काच बसला. तसेच तिच्या साठी हि गोष्ट पण शरमेची होती की तिचे एडमिन डिपार्टमेंट काय विचार करत असतील.


तर अशा प्रकारच्या घटना ह्या संशयीवृत्ती मुले दोन प्रेमाच्या जीवनाचे नाते संपुष्टात येण्या सारखेच असते.

Monday, 2 November 2015

पहिले प्रेम हे तर पाहिले प्रेमच असते....................................


“पहिले प्रेम” वि. स. खांडेकरांची कांदबरी वाचल्यानंतर मनात कितीतरी गुद्गुद्ल्या होऊ लागल्या. असे वाटले की खरच पाहिले प्रेम कितीतरी आकर्षक वाटत. मलाही ते पाहिले प्रेम अगदी हवहवस वाटते. त्याच्यावीण्या जीवन अगदी नकोस वाटते. पाहिले प्रेम हे पाहिले प्रेमच असते. त्याची जागा कोणी दुसरे किंवा अनेक प्रेम घेऊ शकत नाही. पाहिले प्रेमाचे उदाहरण म्हणजे जसे स्त्री ला पहिल्या बाळची जी चाहुल लागते त्याप्रमाणे हे पाहिले प्रेम असत.

पाहिले प्रेम हेच शेवटचे प्रेम असे नशिबात खुपच कमी लोकांमधे होत असते. खुपदा पहिल्या प्रेमानंतर जेव्हा जीवनाची वास्तविकता समोर ठासते तेव्हा पहिल्याच प्रेमाची झीज दुसरे प्रेम पूर्ण करते. कारण ते कारावच लागत. आपल्या समाजात तितकीशी अशी पहिल्या प्रेमाची मान्यता अशी नाही. मोठ्या मानसांसाठी जी मुलगी आवडली त्याच-त्यांच्याच (मोठ्यांच्या) पहिल्या प्रेमासंगे लग्न करावे लागते. परंतु पहिल्या प्रेमाची झीज हे दुसरे प्रेम कधीच भरू शकणार नाहि.

समजा लग्नानंतर जर खुप वर्षानंतर जर पहिल्या प्रेमाला भेटलो तर जी गुदगुदी त्याच्यासंगे वाटत असे ती गुदगुदी तेव्हा हि तशीच जिवंत मनात असते. ती सर हे दुसरे प्रेम कसे बरे भागवू शकेन? जो विलक्षण आनंद पहिल्या प्रेमातच असतो.

पहिल्या प्रेमासाठी सर्वकाही सोडून द्याव अस वाटते. अगदी तेच आणि तेच आयुष्यभर रहावेसे वाटते. त्याच्या आवाज, स्पर्श नेहमी आपल्या भोवती अगदी फुलपाखराप्रमाणे रहावा असे वाटते.

तो माझ्याकडे असावा आणि कुठे त्याने जाऊ नये असे वाटते. त्याच्या हाताचा स्पर्श आजही कुठेतरी माझ्या शरीरावर फिरत रहावा आणि जरी कल्पना केलि ना तरीही त्या स्पर्शाची जाणीव जिवंत वाटते.
त्याला कळत कसे नाही की, इतक्या उत्कंठेने त्याची आठवण करते. तरी हि माझा आवाज त्याच्या पाशी जात नाही. आणि जरी गेला तरी तो मला पाहणार नाही इतकी तर खात्री मला पटली आहे. कारण जवळ येउन त्याने मला काहीही सांगितले नाही की मी त्याला पसंत करते किंवा मी त्याला पसंत करते. मी त्याला आवडते की नाही हे सुद्धा मला माहीत नाही. त्याच्या जवळ जाऊन सांगावेसे वाटते, भरभरून बोलावस वाटते पण तो कुठे एकणार आहे. तो हेच म्हणणार मला, “इथे बघ अशी रडू नको, हे जग असेच आहे, ते आपल्याला वेगळ करणार त्यापेक्षा आपणच दोघे एकमेकांपासून वेगळ होऊन जाऊया”. असे शब्द त्याने उच्चारल्या नंतर मी तरी कुठे काय बोलणार. मि बस शांत पणे एकून त्याचे सगळ एकून घेणार.


आणि शेवटचे त्या पहिल्या प्रेमाला माझा अखेरचा सलाम असेल. पण पहिले प्रेम हे तर पाहिले प्रेमच असते. 

Thursday, 29 October 2015

जिया जाए ना दुःख के बिना...................

आजकल औरतो के बारे में सुनते पढ़ते मन तो काफी परेशान हुए जाता है. कभी-कभी कुछ उसके सुझाव नजर आते है तो कभी मेरा मन अपने आप से निशब्द हो उठता है. क्या किया जाए ऐसे वक्त में समझ नही आता. बस उन्हें पढने तो कभी सुनाने के बाद में चुप सी हो जाती है. रातको सोते समय उनकी बातो को एक कार्यकृम की तरह रिकैप आखो के सामने तैरता है. उसके दुसरे दिन फिर वही औरते, लडकियों के शोषण, परेशानी की काहानिया. तो तो कभी अखबारो में पढ़ते हुए तो कभी उनके जुबानी कहानिया जिसे में कभी घंटो भर सुनती हु. rogers की तरह empathy, नॉन-judgmental attitude दर्शाती हुई. लेकिन जब में सामन्य जनता की तरह हो उठती हु तब मेरे मुह से केवल वास्तिविकता के शब्द हो उठते है, उस आदमी के लिए केवल गालिया और उस औरत के लिए केवल संघर्ष, स्वंतत्रता की शुरुवात करने के लिए कहती हु.

न जाने यह विषय मेरे आसपास क्यों घूम रहे है. इसलिए भी क्योंकि मैंने यहा पर औरतो के साथ काम कर रही हु. हर दिन में इन्ही कहानियों से झुंझ रही हु. क्या किया जाए इसके लिए समझ नही आता. तुम कहते हो लिखो. तो लिख रही हु. मुझे भी तो लिखने की जरूरत है. क्योंकि फिर मै अपने आप से बात करने लगती हु. अब कितना बात अपने आप से करुँगी या उन्ही औरतो की कहानिया अपने आँखों के समाने तैरती रहूंगी. उससे अच्छा लिख लो.

मै तो इन कहानियों को सुन रही हु लेकिन यह औरते तो हर दिन अपने जीवन से झुंझ रही है. वे चाहते हुए भी उन्हें बदल नहीं पाते. कुछ औरते बोलकर उन सारी परेशानी से दूर हो जाते है तो कुछ लोगो को केवल हर दिन के परेशानी से आदत सी हो जाती है. उन्हें दर्द तो होता है लेकिन तब पर भी यही सोचते हुए की यह तो हर दिन की दर्द और परेशानी है. तो चलता है. कुछ औरतो को पता होता है की उनके साथ जो भी हो रहा है वो पूरी तरीके से गलत है. लेकिन वो चाहते हुए भी उससे निकल नही पाते क्योंकि उनके पास कोई भी साधन या मदद नही है की वे इस हिंसा से बच पाए. कुछ औरतो के पास मदद तो होती है लेकिन किन्ही कुछ लोगो की वजह से वे चाहते हुए भी निकल नहीं पाते.

अपने दोस्त की एक आखरी लाइन सुनने के बाद की, “खामोशी से बेहतर है की बातचीत होती रहे”. इसकी जरूरत वाकई में मुझे लगनी लगी है. क्योंकि औरतो को सुनते-सुनते मन तो थक जाता है, परेशान हो जाता है. अच्छा है की उनके साथ कुछ नुक्से अपनाये जाए ताकि उन्हें पलभर के लिए सुकून मिले. वो कुछ पल के लिए जीवन की तमाम परेशानी से दूर हो जाए उस दस मिनिट के लिए. जैसे की कोई कुछ उनके जीवन की परेशानी बता रहा हो. उनके साथ कुछ रिलैक्सेशन तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाए. जब उनकी पूरी स्टोरी पूरी हो जाए. क्योंकि मै जानती हु मै उनके पति या उनके अत्याचार घरवालो से उन्हें छुड़ा तो नही सकती लेकिन जब वक्त आएगा तब जरुर मै यह करने का धाडस उठाऊंगी. उन्हे उनके जीवन को फिर एक बार सुंदर बनाने की कोशिश करेंगे जो उन्होंने बचपन में जी लिया था. लेकिन उस बचपन वाले जिदंगी में भी तो उन्होंने अनेक कष्ट उठाये है, बताती है कुछ औरते की कैसे उन्हें परेशानी खाने-पिने, पढने, रहने के लिए होती थी उनके माँ के साथ. तो वो सुंदर जीवन उन्हें उनके बचपन में भी नसीब न था. लेकिन मन करता है की उनके इस जवानी या बुढापे में तो उस जीवन को दिया जाये. लेकिन इस में भी दिक्कत है. जिन औरतो ने बचपन से हि दुःख अपने सर में ढोए है वे कभी भी खुश नही रहना चाहते क्योंकि जब तक वे उन दुखो को बार-बार नही लेगी या किसी और औरत को लेते हुए नही देखेंगी तब तक वे खुश नही रहेगी. जैसे ख़ुशी इंसान बार-बार मनाते है वैसे हि दुःख भी वो बार-बार मनाना चाहते है. वे उससे निकलने का नाम हि लेती. दुःख भी उनके लिए जरूरत बन चुकी है. वे अपने जीवन में कोई परिवर्तन नही लाना चाहती. अगर जब कभी उन्हें ख़ुशी देने की कोशिश होती है उस पल के लिए होती है लेकिन उसके कुछ देर बाद या दुसरे दिन वो फिर एक बार दुःख की राह देखती है. क्योंकि उसके बिना उन्हें चेन हि नही आता. वे चाहती है की दुःख भी हमेशा ख़ुशी की तरह उनके साथ रहे. उसके बिना जिदंगी, जिन्दगी नही होती. उनको हमेशा लगता है की दुःख लेने के बिना खुशिया आप मना नही सकते. इसलिए दुःख का बहुत बड़ा सहभाग है खुशियो के लिए. उसकी जरूरत हमें हमेशा होनी चाहिए.

कुछ बुजुर्ग औरते कहती है की, आजकल की लडकियो दुःख नही चाहिए. हमेशा ऐशोआराम वाली जिन्दगी उन्हें चाहिए. उसी में वे रहना चाहती है. दुःख नही देखती इसलिए जीवन कैसे भी बिताती है. बहुत सारा wastage करती है तो वो खाने, पिने, कपडे का हो. उन्हें पैसो की वैल्यू नही होती. वो आगे कहती है की, हमारे वक्त में हमें खाना नही मिलता था, किसी के घर में झाड़ू-पोछा करो, या दो घर के बर्तन माच के आओ उसके हि बाद खाना मिलता था. जब मैंने शादी की थी तब मैं केवल एक साडी पर इस घर में आई थी. ससुर मुझे कितना गालिया देता था, मै खाना नही देती हु ऐसे लोगो को बताता था, मुझे और मेरे सास को मारने के लिए दोड़ता था, घर के बर्तन बेचकर दारु पि लेता था. मेरे सामने वो नंगा हो जाता था. मैंने अपने सारे परिवार के लिए बहुत कुछ किया. मेरा पती दो शब्द भी कुछ ससुर को नही बोलता था. मिटटी और चटाई के घर में मैंने दुःख उठाए” इस तरह के जीवन के अनुभव यह औरते साझा करती है. यह अनुभव उनके मन में इतने बसे हुए है की उनसे उन्हें छुटकारा हि नही. वे अपने जीवन को अच्छे से बिता हि नही सकती ऐसे उनकी सोच हो उठती है. अगर उन्हें अच्छे आराम वाली जिदंगी भी मिले तो भी वे बाहर जाकर काम करेगी. घर के काम सुबह से लेकर रात के सोने तक करेगी.

कहते है की औरते भावनात्मक रूप से काफी स्ट्रोंग होती है. जिसका कोई भी सबंध नही है औरतो के साथ. क्योंकि भावनाये तो सबके साथ एक जैसे हि होती है. उसकी तीव्रता कभी ज्यादा –कम होना काफी स्वाभाविक होती है. तो वो किसी महिला की हो या किसी पुरुष की हो. नेचर ने भावनाओं को महिला और पुरुषो में एक जैसा हि तो बाटा है.

अब एक चीज तो मैंने मान ली है. अगर स्त्री को अपने जीवन को अस्तित्व के उपर काम करना है या अपना अस्तित्व को दिखाना है. तो पहले वो अपने आसपास के लोगो से दूर चले जाए. अपने जीवन को अपने तरीके से बिताए. उसके पहले उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता लाने की जरूरत है. वो एक बार आ जाए तो देखो बदलाव कितने तेजी से आता है. वो औरत उस बन्धनों से मुक्त, दूर हो जाती है. उसके बाद भी औरतो को सहना पड़ता है और भी कई सारी परेशानी से लेकिन देखा जा सकता है.