Tuesday, 10 February 2015

गालियों की संवाद में जरुरत..............................

आजकल स्कूल में काम कर रहे है. कई सारे बच्चे खेलते-खेलते एकदूसरे को ऐसे ही या अपने शब्दों में इस्तेमाल कर देते है. उसमे उन्हें किसी भी तरह की "शरम", "बुरा" नहीं लगता. जब सुनती थी तो बड़ा ही अजीब सा लगता है लेकिन वो भी मेरे लिए अब सामान्य से हुआ है. तो इसी विचार को रखने की कोशिश हो रही है तो आइये पढ़ते है उसके बारे में.
गालीगलोछमारनाचिल्लाना यह बाते मेरे लिए बड़ी ही आम लगती है. उसमे अपने पढ़ाई में एक आयाम जुडा हैकिसी को बुरा ना लगे इस तरह का हमें बरताव न करना. जो वाकई में सोचने की जरुरत है. तो इस सिद्धांत को लेकर में आगे बढ़ रही हु. गालियों को बचपन से सुनते आये है. किसी ने मुझे दि भी है और किसी को देते हुए सूना भी है. जब भी हमारे मोहल्ले में किसी का झगड़ा होता है तब गालियाँ सबसे ज्यादा दि जाती है सामने वाली पार्टी को. उसमे यह बात पता नही चलती की हुआ क्या हैगालियाँ बकने के बाद अगर कोई पूछे की क्या हुआ तो उस झगड़े का पूरा सारांश बताया जाता है.
जो बच्चे या लोग इस तरह के परिवार से आये है उन्हें गालियाँ बड़ी ही बेवकूफी
बुरीबत्तमीजी वाला व्यवहार लगता है. लेकिन गालियाँ  जिनके जीवन का रोजमर्रा भाग है गालियाँ उनके लिए कोई भी हुआ नहीं होता गालियों को लेकर. कुछ लोग गालियाँ देने से पहले सोचते है तो कुछ लोग गालियाँ ऐसे भी बिना किसी हिचकिचाहट से देते है. उसमे कोई भी उन्हें बुराईकोई क्या बोलेगा इस तरह से संदेह नहीं होता. बस मन में आया तो दे दिया. कुछ लोगो को गालिया नहीं दि तो दिन नहीं जाता.

रिसर्च के मुताबिक़ गालियाँ देनेवाला समाज में अपनी छाप छोड़ता है की वो कैसा है
अक्सर गालियाँ देनेवाला बुरा माना जाता है. उन्हें अलग सी लेबलिंग दि जाती है. ज्यादा करके जिनका सामजिक-आर्थिक स्तर नीचा होता है या जो लोग कम पढ़े-लिखे होते है उनके संस्कृती में गालियाँ अधिकतर पाई जाती है. लेकिन मैंने यह भी देखा है की अच्छे पढ़े-लिखेआर्थिक स्तर उचे वाली भी लोग गालियाँ देते है. तो उन दोनों समाज में कोई भी अंतर नहीं है. 
कई बार मुझे लगता है और रिसर्च  भी यही कहता है की गालियाँ यह लोगों के बीच का संवाद का भाग हैअगर एक ही तरह के लोगो में आप रहने लगते है तो वहा पर गालियाँ देना बहुत बड़ी बात नहीं होती. उनके लिए वो एंटरटेनमेंट का भाग बनता है. और एकदूसरे के साथ रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए गालियाँ महत्वपूर्ण हो जाती  है. गालियाँ उनके जीवन की बोली बन जाती है.
मैंने देखा है ट्रेन में चढ़ते और उतरते हुए अगर किसी औरत को धक्का लगे तो वो गालियों का वर्षाव कर देती है. उसमे सामने वाले को अगर आदत ना हो तो बस शांत सा हो जाता है. वो राह में होता है की यह औरत कब चुप बैठेगी.
गालियाँ एक तरह से गुस्से को उतारने के लिए भी बहुत अच्छी तरीके से काम करता है. क्योंकि कही ना कही व्यक्ति को अपने भीतर के गुस्सेइर्षा को बाहर उतारने के लिए मदद करता है. उसके बाद ही वह व्यक्ति शांत हो जाता है. अपने कुछ दोस्त अंग्रेजी में एक शब्द हमेशा इस्तेमाल करते है “fuck” जो उनके लिए गालिया नही बल्कि कुछ बुरा हो जाए तो उसे जाहिर करने के लिए यह शब्द है और तो और वो शब्द उनके लिए रोजमर्रा जीवन में इस्तेमाल करते है. 
ज्यादा करके गालियाँ औरतो से जुडी हुई होती है सामने वाले को चुप्पी कराने के लिए. लोगों में ऐसा माना जाता है की, “मा-बहन की इज्जत सबसे बड़ी होती है” इसलिए सामने वाला चुप हो ही जाता है. बिना कुछ कहे वो सबकुछ सुन लेता है. तो कुछ लोग सामने वाले को अलग शब्दों से उसे वही गाली फेकता है. वे गालियाँ भी औरतो के सबसे सुंदर शरीर के भाग को जहा पर एक जीव का निर्माण होता हैउसको शब्दों में लेते हुए देते है. जिसमें कई सारे लांछास्पद शब्द को इस्तेमाल किया जाता है.  
गालियों की इन्टेसिटी भी भाषा से बदलती है. अगर गुजराती में गालियाँ सुनो तो कानों को बंद करने की बारी आती है. मराठी में तो थोड़ा सुन तो सकते ही है. और अंग्रेजी की गाली तो स्टाइल से भी दि जाती है और वो आजकल के रोजमर्रा जीवन में इस्तेमाल कर लेते है.  

Sunday, 11 January 2015

मेरे दिमाग में यह चल रहा है....................................


(हिंदी माध्मातिल ७ वीच्या वर्गात गेले असताना. त्यांच्यासंगे पहिल्यांदा लिहीण्याचा कार्यक्रम सुरु केला. त्यांना मी सांगितले की ह्यावेळेस जे मनात येते ते त्यांनी लिहून काढावे. त्या मधे असेही होऊ शकते की, जो विचार आता आला तो तुम्ही लिहून काढला पण त्याचबरोबर दुसर्या ही विचाराने उडी मारली तर ते लिहित जा. मग ते काहीही असो. यास मुक्त लेखन म्हणतात.
मग मुलांनी सुरुवात केली लिहायला. प्रत्येकाने आपापल्या गोष्टी लिहिल्या. त्यास शब्द दिले. पाहुया की त्यांनी काय लिहिले)

मेरे दिमाग में यह चल रहा है की मै अच्छे से पढू और लिखू और बड़ा होकर कुछ अच्छा इंसान बनू. कुछ नौकरी पाऊ और अपने परिवार के साथ रहू. 

मेरे दिमाग में यह चल रहा है की मै बड़ा होकर क्रिकेटर बनू. 

मेरा मन अभी सोच रहा है की, मै क्रिसमस के दिन मै कौन से कपडे पह्नुगी. और उस दिन मै दीदी को क्या तौफा दू? नए साल के दिन मेरा पूरा परिवार घूमने के लिए जा रहे है. इसलिए मै बहुत उत्साहित हु जाने के लिए. मै अभी सोच रही हु की टीचर क्या पढ़ायेगी? मेरे दिमाग में यह बात चल रहा है की _____ का हाथ जल्दी से ठीक हो जाए. 

मेरे बाजूवाला मुझे परेशान कर रहा है. मेरे बाजूवाले लड़के ने पाच/छह पेज फाड़ दिए. मुझे फूटबाल खेलना पसंद है. मै पैसा जमा कर रहा हु. मै नया बैग खरीदूंगा. मै स्कूटी खरीदूंगा.

मुझे गाना अच्छा लगता है. मुझे चित्र अच्छा बनाना अच्छा लगता है. मुझे लिखने मै मजा आता है. मुझे पैसे जमा करने में मजा आता है. मुझे क्रिकेट खेलने में मजा आता है.

मै स्कूल से छुट जाउगी तो घर जाकर कपडे बदली करुँगी. और फिर मै अपनी माँ को अस्पताल ले जाउंगी. वहा से आते समय, मै आइसक्रीम खाऊँगी फिर घर जाकर अपना गृहकार्य पूरा करुँगी. मेरा गृहकार्य पूरा होने के बाद मै थोड़े देर आराम करुँगी. फिर मै आधा घंटा खेलूंगी और फिर मै पढाई करने बैठ जाऊँगी और मै खाना खाकर सो जाऊँगी. 

मेरे मन में यह चल रहा है की, मेरे स्कूल में डांस कॉम्पिटिशन चल रहा है. अगर मेंरे हाथो में प्लास्टर नहीं लगा होता तो मै भी डांस कॉम्पिटिशन में होती.

जब कोई खेलता है तो मुझे भी लगता है की मै भी खेलु लेकिन मै नहीं खेल सकती और अब कुछ ही दिनों में मेरा प्लास्टर निकल जाएगा. और मै यह सोच रही हु की यह टीचर क्या मजेदार चीजे करायेगी. 

मेरे मन यह चल रहा है की आज मै स्कूल छुट जाने पर माँ के साथ बाहर घूमने जाऊँगी और अपने मामा के घर जाऊँगी और खूब मस्ती करुगी. फिर घर जाकर अपना गृहकार्य पूरा करुगी. 

मुझे मन कर रहा है की, हम लोग खेलने निचे जाए और हम सब खेले. मुझे डांस क्लास जाने का मन हो रहा है. मुझे पुलिस बनना है क्योंकि यह मेरे माँ का सपना है. 

मेरे मन में अभी यह है की, मै अभी घर जाकर फिर स्कूल में डांस के लिए भी आना है. फिर मै डांस के बाद घर जाकर कपडे भी धोने है. फिर पढ़ना है. और उसके बाद खाना है और सोना है. फिर सुबह उठना है और स्कूल जाना है. 

मेरे दिमाग में यह चल रहा है की, पढ़कर इंजीनियर बनू. और मै अपने माता-पिता का सिर ऊँचा करू. और उनको अच्छी-अच्छी जगह दिखाऊ. और मेरे दिमाग में यह चल रहा है की, मै घर पर जाके पढूँगा और अपने भाई-बहन को भी पढाऊँगा और अपने आसपास वालों भी पढाऊँगा. इससे सब लोग मुझसे प्यार से बात करेगे. 

मै घर पर जाकर वैज्ञानिकोके बारे में कुछ जानकारी प्राप्त करुगा. जिससे मुझे विज्ञान के बारे में कुछ जानकारी होगी. फिर मै कुछ समय तक शामको बगीचे में टहलने जाऊँगा. फिर मै शामको पढने बैठूँगा. फिर मै अपने मित्र के साथ खेलूँगा और मै अपने सारे मित्र के साथ क्रिकेट, कब्बडी, पकड़ा-पकड़ी, खो-खो, और कैरम खेलूँगा. फिर मै घर जाकर अपने भाई, बहन के साथ पढाई करूँगा.

मेरा मन खूब नाचने, दोस्तों के साथ बात करने, आइसक्रीम खाने को, फूटबाल खेलने और मिठाई खाने को कर रहा है.

मै घर जाकर टीवी देखुंगा. फिर बाद में सो जाऊँगा, उठने के बाद घुमने जाऊँगा. घुमने के बाद मै भाषा का विषय पढूँगा. फिर खाऊंगा, फिर सो जाऊँगा. सुबह उठकर स्कूल आ जाऊँगा. स्कूल पहुचने के बाद गणित का विषय लिखूंगा. घर जाने के बाद क्रिकेट खेलूँगा, खेलने के बाद टीवी देखुंगा. फिर विज्ञान का विषय पढूँगा. पढने के बाद खाना खाऊँगा. फिर सो जाऊँगा. 

Saturday, 10 January 2015

मनातले विचार................

(७ वीच्या वर्गात गेले असताना. त्यांच्यासंगे पहिल्यांदा लिहीण्याचा कार्यक्रम सुरु केला. त्यांना मी सांगितले की ह्यावेळेस जे मनात येते ते त्यांनी लिहून काढावे. त्या मधे असेही होऊ शकते की, जो विचार आता आला तो तुम्ही लिहून काढला पण त्याचबरोबर दुसर्या ही विचाराने उडी मारली तर ते लिहित जा. मग ते काहीही असो. यास मुक्त लेखन म्हणतात.
मग मुलांनी सुरुवात केली लिहायला. प्रत्येकाने आपापल्या गोष्टी लिहिल्या. त्यास शब्द दिले. पाहुया की त्यांनी काय लिहिले)

माझ्या मनात अस वाटल आहे की मला घरी जाऊन काम करून अभ्यास करायचा आहे आणि वही पूर्ण करायची आहे. व् पाठांतर करायचा आहे. कारण या वेळी आमच्या टीमला जास्त मार्क मिळणार अस वाटत. घरी गेल्यावर कोणता अभ्यास करायचा जो लवकर होईल.

मला घरी जाऊन अभ्यास करायचा आहे. घरी काम आहे आणि पाठांतर करायच आहे. ६:३० वाजता क्लासला जायचे आहे. आणि आता मला स्कॉलरशिप ची गणिते सोडवायची आहे आणि भविष्यात मला जागरूक महिला पुलिस कमिश्नर बनायचे आहे. आई, बाबा, माझ्या शिक्षिका यांचे नाव मोठे करायचे आहे. मला मम्मीचे स्वप्न साकार करायचे आहे.

मी कधी घरी जाउन भावाला घेणार? मी घरी जाउन खेळणार कधी? माझा अपूर्ण स्वाध्याय, अपूर्ण निबंध वहित पूर्ण करायचा आहे. माझ दप्तर तुटल आहे, माझी बहिन मला दप्तर देणार की नाही. 
  
मला आता डांस करायला जायच आहे. माझ्या आता मनात येते की, मी खेळायला जायचे आहे.

आज मला घरी जाऊन खुप अभ्यास करूशी वाटते आज मला खुप आनंद वाटला कारण आह्माला शिक्षकांनी आह्माला खुप चांगल शिकवल आहे. आज आमची प्रश्न उत्तरे पाठ घेतली. आमची कविता घेतली म्हणून आह्माला खुप आनंद वाटला.

अभ्यास चांगला करीन. रोज अभ्यास करीन. वाचन करीन. रोज शाळेत येणार. आणि नाही माहीत.

माझ्या मनात येतय की, मला क्लास चा खुप अभ्यास आहे. आणि माझ्या मामाची मुलगी येणार आहे. पण मला अस वाटत की, तीला कधी भेटते? मी कधी गेम खेळेल माझी मोठी आई तीची बहिण यांना दाखला पाहिजे आहे. तर आई बोलली अर्ज लिहून द्यायला. माझ्या बहिनीचा बर्थडे आहे तर काय तीला गिफ्ट देऊ?

माझ्या दोन बहिणी शिकल्या नाही. तर माझ्या आई-बाबांना वाटत की मी सुद्धा शिकणार नाही. पण मला वाटत की, मी पण वकील किंवा पोलिस होउन दाखविणार. आता मी आह्मी झोपडपट्टीत राहतो मग मी मोठ्या घरात राहणार.

मला विचार पडलाय की मला आता टीचरांनी प्रश्न दिलेली आहेत, ते सोडवायचे आहेत. ते झाल्यावरती मला डांस मधील स्पर्धेतील गान चुकल तर मला टीचर ओरडणार, ही मनातील भीती आहे. डांसमधे आमच्या वर्गाचा पहिला नंबर यावा ही इच्छा आहे.

मनात काहीही चालत नाही. घरी जायचय. रात्री खेळायला जायचय, अभ्यास करायचा, झोपयचय.

मला घरी जाऊन अभ्यास करायचा आहे. मला माझ्या रुपाली ताईला घ्यायला जायचे आहे. मला क्रिकेट खेळायचे  आहे. मला गाणे पाठ करायचे आहे. मी गावी केव्हा जाणार?

मी सुट्टी मधे गावी नक्की जाणार.

माझ्या शाळेत डांस होणार त्याच्यासाठी आह्मी गाण तयार केले आहे. त्याच्यासाठी डीजे मागवला आणि रंगीबेरंगी साडिया पहनने के लिए बोला है. तभी डांस टीचर का टेलीफोन बजा और टीचरने फोन के बाद डांस का लेक्चर दिया. और यह डांस पृथ्वी के शेतीवाडी उपर है.

शाळेमधे एक लेक्चर टीचर आल्या होत्या त्यांनी खुप छान समजावून सांगितली. शाळा सुटली एक साडी वाला साड्या घेउन विकत होता. त्यातली एक निळ्या कलरची साडी मला खुप आवडली. मी मम्मीला सांगायला फोन केला तेथे खुप मोटा आवाजाचा डीजे होता. म्हणून फोनवरुन काही एकु येत नव्हते. पृथीवरच्या आशिया खंडातील प्रसिद्ध शहरांची नावे मी वहीत उतरली. बाजुला एक स्टेज बांधला होता. अर्धी मुले गाणी गात होती, अर्धी मुले डांस करत होती. आमच्या घरी कही फंक्शन असले तर आह्मी डीजे लावतो आणि कधी आमच्या घरी हळद असली तर आह्मी डीजे लावतो आणि कधी बारसा, लग्न, साखरपुडा, असल तर आह्मी डीजे लावतो. माझ्या काकाच्या मुलाचा बर्थडे होता आणि तिकडे डीजे लावला होता आणि मी तिकडे नाचत होती.


आज मी घरी जाऊन मम्मीला सांगेल की मला झू मधे ने. तेथे जाऊन त्याच्या प्रजेची माहिती घेईन, झूमधे कामगार लोक प्राण्यांना कधी वागणुक देतात, झूचे लोग त्यांना खायला देतात की नाही.     

Wednesday, 7 January 2015

कुछ शब्द अनुभव के लिए.....................

अनुभव तू ही बता कैसे जिया जाए तुम्हारे बिना? तुम तो हर वक्त मेरे पास रहती हो. कभी कैंटीन में चाय पिते हुए, तो कभी दोस्तों के साथ गप्पे लड़ाते हुए. कभी तो वो नींद में भी नहीं छोड़ती, सपनो के जरिये नए अनुभव फिर एक बाद पैदा कर देती है. कौन कहता है की मै अकेली हु. मेरी यह सहेली मेरे पास हमेशा रहती है एक साए की तरह. मेरा वो पीछा कभी छोड़ना ही नही चाहती. क्या मै उसे इतनी पसंद हु तुम्हे. तुम्हारे बिना जीना याने पाणी बिना समुन्दर.? इतना भी लगाव ठीक नही. किसी की नजर ना लगे. मुझे भी तो तुम्हारी अब आदत हो गई है. लगता है की अकेले ही जीवन को गुजारा जाए लेकिन तुम किसी ना किसी परिस्थिति के जरिये मुझे मिल ही लेती हो. हर पल मेरे साथ रहती हो. एक सास की तरह. कभी तो अकेला छोड़ दिया करो. यह जिद्द अच्छी नहीं. अब इतनी भी तुम बच्चे की तरह गुस्सा न हो. मै जानती हु तुम मेरे बिना ना जी पाओगे. समझती हु तुम्हे. मेरे शब्द, मेरी सास और अहसास हो तुम. एक अलग ही जगह मेरे जीवन में तुमने बना ली है. इस जगह कोई कब्जा करे वो तुम्हे पसंद नही. मेरी प्रिय, यदि मै किसी से कितना भी प्यार करू लेकिन मेरा पहला प्यार तो तुम हो. मेरे जन्म से लेकर मृत्यु तक तुम्हारा बसेरा मेरे जीवन में एक काले तील की तरह तुमने रखा है. तुम्हे कैसे भुला जाएगा? अभी तो थोड़ा हस दो. हस दिया बहुत अच्छे. तो चलो लिखते है तुम्हारे बारे में. .
अनुभवों का भी क्या कहना?
उसका अलग ही अंदाज है,
उसकी एक अलग ही पहचान
कब वो आपके जीवन में खुशी-दुखों का सावन लाये,
जो कभी ना पता चले.
लेकिन आखिर में उसे गाली भी देते है,
क्यों आया तू? किसलिए आया?
अनुभवों से इन्सान सीखता है.
अनुभवो से वो आगे बढ़ता है,
तो कोई रुक जाता है.
कुछ अनुभव रुला देते है,
तो कुछ हसा देते है.
कुछ अनुभव जीवन की सीख देते है.
तो कुछ याद रहते है,
तो कुछ भूल जाते है.
लेकिन न जाने वो याद बनकर आ जाते है.
अनुभव के बिना भी क्या जीना,
वो तो जीवन का हिस्सा है.
उसे हटाया जाना नामुमकिन है,
क्योंकि वो ही एक आपकी पहचान है.
अनुभव जीवन पर बड़ी छाप बनकर रहती है.
उसे मिटाना आसान नहीं.
अनुभव कभी दिखती है,
तो कभी अनदेखी हो जाती है.
इन्सान नही जानता की वो कब कैसे रंग लाएगी,
उसके रंग भी कई तरह के है,
कुछ रंग बहुत ही सुनहरे है,
तो कुछ उदास भरे.
ऐसी है यह अनुभव की कहानी की,

कुछ खट्टी तो कुछ मीठी.

Wednesday, 31 December 2014

मै कैसी हु?............................................

आज अपने दोस्त ने पूछा की मै कैसी हु
जवाब में तो था, “मै ठीक हु
मै वैसे ही हु जैसे थी
मै हर दिन बदलते रहती हु 
मै वो नही रह पाती
जिसे रहना है 
मै वैसे ही हु जो तुम मुझे देखती हो  
मेरे मन के भीतर तुम झांक नहीं सकती 
यह जानने के लिए की मै कैसी हु 
मै वैसे हु जो तुम मुझे अपने बाहरी जीवन में देखती हो  
मेरे ओठों की हसी, मेरी आँखों के चमक से 
मेरा जीवन को तुम पढ़ लेती हो   
मै अंदरूनी जीवन को तुम क्या जानो?
जिसे जानने के लिए तुम्हे मेरे मन के भीतर को झाकना होगा 
मुझसे प्यार भरी दोस्ती करनी पड़ेगी 
तब तुम्हारे सवाल का जवाब दिया जाएगा. 

जवाब में तो था, “मै ठीक हु 
जवाब देने के बाद मन में एक अचानक से शांती लगने लगी.
आगे और क्या जवाब दिया जाए अपने दोस्त को वो समझ नहीं आया?
लेकिन क्या मै वाकई में ठीक हु?
दिमाग में कई सारे विचार चलते रहते है दिनभर
उसके लिए अपने खुद के साथ झगड़ा शुरू हो जाता है
कभी अपने से खुश हु तो कभी रूठ लेती हु
लेकिन फिर एक बार मन मुझे मनाने चला आ जाता है
मुझे बाहों में भरकर फिर एक बार शुरू जीवन की रफ्तार को शुरू कर देने के लिए कहता है
अगर बीच में ही कुछ गड़बड़ हो तो मेरा मन कहता है कोई बात नहीं
फिर एक बार अपनी रोजमर्रा जीवन को जीने के लिए तैयार हो जाती हु
मेरे मन को मानते हुए. 

“आजका दिन यहोंवा ने बनाया है.....................”

आजपासून नविन वर्षाला सुरुवात होणार.

कितीतरी गोष्टी नव्याने होतील.

त्यात काही गोष्ट नविन वाटतच नाही

म्हणजेच रोजचे आयुष्य

नविन होईल तर माझी नविन नौकरी, नविन नाती-गोती, आणि बरेच काही.

बाकी पुढील वर्षात असतील ब्लॉक प्लेसमेंट्स, निरोप आपल्या कॉलेज ला त्यासंगे पास होण्याचे प्रमाणपत्र.

तसे पाहायला गेले तर प्रत्येक दिवस हां नविन असतो.

मग पुढचे वर्ष कश्यावरुन नविन?

हो २०१४ चे फक्त २०१५ होणार आहे, आता कळले हेच ते नविन.

दिवाकरजी म्हणायचे, “आजका दिन यहोंवा ने बनाया है.....................”

आणि त्यासंगे आनंद व्हायला ही सांगत होते 

मग तर प्रत्येक दिवस नविन आहे बर का वाचकहो!

मग का नाही प्रत्येक दिवस साजरा करुया.......................

Thursday, 11 December 2014

“तुम्ही बिल्डिंग मधे राहता”?.........................................


आजकल BMC स्कूल में जाने का मौक़ा मिल रहा है, एक फील्ड वर्क के स्वरुप में. कई सारे अनुभव मुझे करीब से जानने, महसूस करने मिल रहे है. बच्चे मुझे कई सारे सवाल करते है की मै कौन हु? क्या काम कर रही हु?

तो कल तीसरी कक्षा के क्लास में चली गयी थी, एक बच्ची ने मुझे यह सवाल किया की, “मै कहा रहती हु”? तो उसी सवाल से अपने पिछले स्कूल के अनुभव याद आने लगे और लगा की उसके बारे में इस सवाल के साथ लिखा जाए.

बच्चो के आसपास अगर कोई उनके उम्र से बड़ी व्यक्ती मिले तो उन्हें बहुत आश्चर्य होता है. लेकिन ऐसे वक्त में बच्चे मेरे बारे में सामन्य व्यक्ती की तरह देखे. वे मुझे अपने जैसा ही माने. मुझे कोई बड़ा न बनाये. तो इस सोच को कविता के जरिये बच्ची को बताना चाहती हु की वो मुझे अपने जैसा ही महसूस करे. 


“तुम्ही बिल्डिंग मधे राहता”?
इस सवाल का जवाब क्या दिया जाए?

मै भी तुम्हारी तरह सामन्य सी जिदंगी जी रही हु.
मै भी तुम्हारे तरह BMC स्कूल में पढ़ती थी.
जैसे तुम पढ़ती हो.
मैंने भी अपने टीचर की मार खाई है.
मैंने भी कक्षा में बैठकर हल्ला-गुल्ला किया है.
पढाई लिखाई में अलिप्त रहना यह मेरा काम लेकिन अन्य चीजो में रहना यह मेरी जरूरत.
एक थी चीज स्कूल में मजा-मस्ती
जो हमेशा अपनी लगती थी, और आज भी लगती है.
अपने आगे असेंबली के वक्त बैठी हुई लड़की के जूओ को उसके बालो में तैरते हुए गौरसे देखा है
और अपने ही बालों के जूओ को उसके हाथों से, अपने हतेली में रखते हुए देखा है
जब लडकियों के टॉयलेट का दरवाजा बंद देखती,
तो मन में संदेह आता की कुछ गड़बड़ है?
लडकों के टॉयलेट को ताकते हुए जाने की हमेशा उत्सुकता थी की कैसा है अंदर?
अपने स्कूल में अच्छी और बुरी टीचर के बारे में बात करते हुए अपने आप में देखा है.
अपनी वो टीचर जब भी पास से गुजरती तो उसके कपडों के खुशबु आज भी नाक में सूंघ रही हु
अपने उस सर की बड़ी आवाज आज भी कान में गूंजती है
उन दोस्तों के हसी-मजाक आज भी याद है
वो स्कूल में लड़के-लडकियों और लडकियों-लडकियों की जोडीया बनाकर चिढ़ाना बुरा लगता था 
लेकिन अभी-कभी आँखे, आँखों से टकरा जाए तो शर्म के मारे आँखे निचे हो जाती है
या फिर कभी हसी फूटती है.
लेकिन आज वो स्कूल नहीं रही जिस स्कूल में पढ़ती थी,
वो स्कूल underdevelopment में चली गई.
उसकी दीवारे, उसकी तस्वीरे मेरे मन के कोनों में दिखती है
वो स्कूल भले ही नहीं लेकिन मेरे आँखों के सामने हमेशा रहती है उन यादों के जरिये........................