Sunday, 19 October 2014

जीवन और त्यौहार..................................

आजकल दिवाली का मौसम चल रहा है. घरोमे साफ़-सफाई चल रही है, घर में क्या बनाना चाहिए, क्या शोपिंग करनी है इसकी चर्चा हो रही है. कई सारे घरोमे में मिठाई, करंजी, लड्डू, नानखटाई बना रहे है. मैंने आज देखा बेकरी शॉप में कई सारी औरते अपने बच्चे, घर की औरतो के साथ नानखटाई बनाने के लिए याने की बेक करने के लिए आई थी. इतनी तेज गर्मी में दिवाली मनाने को उत्साह काफी गहरा था. एक औरत ने पूछा की कैसे बनाए नानखटाई तो बता दिया उसके बारे में भी बातचीत हुई. फिर कुछ देर बाद और एक औरत से बात हो रही थी. मैंने पूछा कौनसे गाव से हो? वो कहने लगी, जोधपुर से. मुझे ख़ुशी हुई, फिर उनके गाव के बारे में बातचीत शूर हुई. मैंने कहा की आपके यहाँ लव मैरिज होता है क्या? उन्होंने कहा की नहीं. मैंने कहा की आप शहर में रहने के बावजूद भी? तो बोली की, “हां! हमारे यहाँ होता ही नहीं लव मैरिज”.
मुझे याद है जिस राजस्थान के गाव में रहती  थी, वहां के एक लड़की को एक दुसरे गाव के लड़के से प्यार था. वे दोनों की अब शादी भी अलग-अलग जगह हो गई है. लेकिन अब भी एक दुसरे के प्रती प्यार है. कभी अगर मिलना हुआ तो बात करते है एकदूसरे से. लेकिन सच्चाई के पार नहीं जा सकते है. अब उन दोनों के सामने जो व्यक्ति है वही उनके लिए प्यार, हमदर्द, साथी है. जिसे शुरुआत में स्वीकारना हर लडके और लड़की के लिए मुश्किल हो सकता है जब उनकी शादी उनके मर्जी के बगैर हो जाती है.


मै जानती हु उन औरतो की जुबानी जिनके जीवन में उनके मर्जी के बगैर जब शादी हुई तो उन्हें क्या-क्या न सहना पड़ा. खासकर करके जब लैंगिक सबंध की बात करे तो, उनके मर्जी के बगैर शारीरक सबंध होता है तो जिस शारीरक तथा मानसिक पीड़ा से उन्हें गुजरना होता है जिनके बारे में वे सिर्फ अपने करीबी दोस्तों के साथ बात कर सकती है.

कुछ लडकियों की कहानी ऐसी है, जिन्होंने अपने इच्छा के अनुसार शादी की है, वो भी अपने पेरेंट्स के ना-पसिंदागार लड़के के साथ. कई सारे लकडिया इन भागे हुए शादी से अपने जीवन से खुश नहीं रह पाई है. उनके चेहरे पर मुझे ख़ामोशी, शादी का बोझ, दर्द नजर आता है. उनमें से कुछ लड़किया उनके जीवन में अपने हमसफर के मानसिक/शारीरिक हिंसा की शिकार है. कई सारे भागे हुए यह कपल बिना किसी के सपोर्ट (फॅमिली) से रह लेते है, कईयो का खुद का घर नहीं होता तो वे भाड़े से घर खरीद लेते है, साल-दो साल में बच्चा हो जाता है, तब तक वे दोनों काम भी करने लगते है. अगर वे पढ़े लिखे है तो नौकरी अच्छी  मिल जाती है. अगर नहीं तो जो भी काम लिए तो कर लेते है. कुछ लडकिया कहती है की शादी नहीं करनी चाहिए. कईयो तो शादी के बाद प्यार की रची-रचाई definition एकदम से शादी के सच के सामने नीली पड जाती है. और फिर हो जाता है उनके जीवन का संघर्ष कुछ बेहतर करने के लिए. लेकिन अगर वे ना कर पाए तो आये जैसे दिन को वो आगे निकल लेते है, प्यार, आदर, मान-सन्मान इनका नामोनिशान मानो होता है नहीं. वे सिर्फ अपने लिए, खुद के लिए जीते है. फिर एक घर में रहने के बावजूद भी लगता है की वे पडोसी है एकदुसरे से. कई सारे लड़के तो अपनी बीवी की पिटाई करते है, नशे की बीमारी भी आ जाती है. कुछ लडकिया तो अपने मन और शरीर बेचने के लिए भी कम नहीं करती अपने जीवन का गुजारा करने के लिए तो उसमे ना वो अपना पेट पालती है लेकिन उसके साथ-साथ अपने पती और बच्चे का भी.

अगर वे लडकिया पढ़ी लिखी है और उनके पेरेंट्स का सपोर्ट है तो उनके आनेवाले जीवन में कुछ तो अच्छा होने के चांसेस है. लेकिन अगर बगैर किसी सपोर्ट से जीवन तो बेहाल हो जाता है.


लेकिन तब पर भी त्यौहार तो हमसे छूटते नहीं. जीवन में कितने भी सारे चिंताए, परेशानिया हो लेकिन त्यौहारो के वजह से फिर एक बार खुश होने का मौक़ा मिलता है जिंदगी भर के लिए तो नहीं पर कुछ पलों के लिए सही. 

Tuesday, 14 October 2014

जनमदिन और उसके पीछे विचार.....................................

हमारे और उनके बीच कितना बड़ा पुल है, जिसे तोड़ने की जरूरत है. मै बात कर रही हु उनके बारे में जो, हमसे बड़े और हम उनसे छोटे. यह फर्क तो रहेगा ही. लगता है की इस वजन को सही में तोलने की जरूरत है.

पापा कहते है की, birth डे सेलिब्रेशन नहीं होना चाहिए. वो इसलिए क्योंकि हमारे पालक ने कभी नहीं किया तो क्यों आपका birth डे करना चाहिए? दूसरी बात कह रहे थे की जो लोग इतने बड़े थे नाम और काम से उन्होंने ने भी तो अपना जनम दिन नहीं मनाया? तो हम क्यों मनाये? उन लोगो के जनम दिन पूरी पब्लिक मनाती है.

अगर मै अपने साइकोलॉजी/काउन्सलिंग के बारे में बात करू तो जनम दिन मनाना चाहिए वो इसलिए की बच्चे को उस दिन के लिए सबको एक साथ आने में भी तो मौक़ा मिलता है की वे अपनी एकदूसरे से ख़ुशी साझा कर सके.

शायद हिन्दू कल्चर में ऐसा था की, घर पर कुछ मीठा बनाया जाता है, बडो के आशिर्वाद लिए जाते है, स्कूल में नए कपडे पहनते थे. आज के जनम दिन तो केक लाना, उसपर मोमबत्ती लगाना, उसे फुकना (वही रोशनी जिदंगी के शुरुआत की) लेकिन उसे फूककर केक काटा जाता है और फिर लोग तालिया बजाते है. कही जगह में बड़े बच्चे, घूमने जाते है, रेस्टोरेंट में रुकते है, शराब पी जाती है. और बहुत सारा खर्चा जिसका जनम दिन मनाने में हो रहा है और जो लोग जनम दिन के मौके पर कुछ तोफे देते है जो की काफी भारी भक्कम होता है.


पढ़ा है की पहला जनम दिन फ़ारो (इस्रायल का राजा) का मनाया गया उसके बाद, ग्रीक से केक आया, फिर यूरोपियन कंट्री में [पार्टी मनाई जाती है. केक को राउंड शेप में होता है क्योंकि वो चन्द्रमा को दर्शाता है और उसके ऊपर लगाये हुए कैंडल्स याने की चन्द्रमा की रोशनी और मोमबत्ती इसलिए भी होती है क्योंकि भगवान आकाश में होते है जिनके लिए यह कैंडल्स होते जिसके जरिये हम खुदा को praise करते है. और जब कैंडल्स को बुझाने का वक्त आता है तो उस वक्त एक विश रखनी होती होती है जो खुदा के पास पहुच जाती है. इस तरह की कहानियाँ बनी हुई है. तो इस हिस्ट्री ऐसे लगता है की यह जनम दिन का कांसेप्ट इंडिया का नहीं है. पता नहीं ढूंड रही थी गूगल में लेकिन मिला नहीं. मै तो बस इतना चाहती हु जनम दिन होता है या नहीं होता है लेकिन एकदूसरे के प्रती प्यार, सन्मान, आदर हो और खुश रहे सब. 

Friday, 3 October 2014

बच्चो की बेरंग दुनिया...................................

*हेमलता से आज पहली बार इतनी बाते की, एक बात अच्छी लगी की उसे अंग्रेजी आती है. वो मुझे कह रही थी की मैंने स्कूल में लिखना, पढ़ना सिखा. उसके दो भाई और एक बहन है. वो अपने बच्चे के बारे भी बता रही थी. लेकिन कुछ ऐसा उसके बच्चे के बारे में जानकारी नहीं मिल पाई. उसने अपना नाम पेपर लिखकर दिया और उसके साथ-साथ अखबार भी पढ रही थी. एक बात अच्छा लगा की वो बड़े उत्साह से बात कर रही थी. 

आज एक नयी लड़की से बात कर रही थी, पुर्णिमा*. उसे बोलना ही नहीं आ रहा था. लेकिन वो लिखकर-चित्र बनाकर बात कर रही थी. लेकिन उसका लिखना मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था. सिवाय उसके नाम के अलावा.

*कावेरी से बात हुई थी. वो है गुलबर्गा नाम के शहर की, वो अपने पिताजी के साथ पूना में आई थी, लेकिन उसके पापा को किसी ने मारा था. उसके बाद वो पुलिस की ओर से ऑब्जरवेशन होम में आ गई थी.



इन बच्चो की जिंदगी इस तरह से गुजर रही है जहापर पर उन्हें अपने जीवन के लिए ऐसी कोई आशा नहीं है. कुछ बच्चो के जीवन की कहानी ऐसी है जिसमे वे आसानी से बाहर निकले पर कुछ तो उसी में ही फसेगे ऐसे लगता है. पता नहीं जब वे अपने घर में पोहचेगी तो उन्हें अपने उनके लोग किस तरह से पेश आयेगे? क्या उनके साथ उसी तरीके की चीजे फिर से नहीं ना दोहराएगी ना? क्या उन्हें उन्ही जीवन का सामना फिर से करने पडेगा? क्या वे जब यहाँ से बाहर निकलेगी क्या वे अपने जीवन को फिर से रंगों से भर पाएगी? क्या उनके घर वाले उन्हें स्वीकार करेंगे? क्या इन लडकियों का घर मिल पायेगा, अगर ना मिले तो क्या उन्हें एक नयी जिदंगी फिर से मिल पाएगी? क्या वे अपने जीवन को बेहतर बना पाएगी? ऐसे कही सारे सवाल मेरे दिमाग में अब के लिए तैर रहे है?

इन्हें इस तरह के institution के बारे में कुछ भी नहीं पता होता. उन्हें हर वक़्त सिर्फ चिटठी का इंतेजार होता है की उनके घर से या कीस संस्था से कोई तो ले जाने के लिए आ जाएगा.

जब भी मेरी मुलाक़ात इन बच्चो के साथ होती तो मुझे पता न चलता की क्या बात की जाए उनसे? हर एक मुलाकातों में हर एक कहानी मेरे लिए होती थी. उस कहानी के बातों को सुनने का ही काम मिला हो ऐसे लगता है. एक दिन अपने फैकल्टी से बात हुई थी की क्या किया जाए? तो वे कह रही थी की जब भी हम वहा पर जाए उन्हें जो वक्त दे रहे है वही बहुत बड़ी बात/काम है. फिर तब से सिर्फ और सिर्फ इसी उद्देश से जाती थी की इन बच्चो को अपना वक्त तो जितना में दे सकू.

इनकी कहानी एकदम सी फिल्मो वाली लगती है. ऐसे लगता है जो जैसे फिल्मो की कहानी सुन रही हु. कभी कभी उस कहानी को सुनते-सुनते उसे खुली आखे देख लेती थी. अब भी मुझे याद है जब उसने कहा थी की मै दुर्गा पूजा के लिए मम्मी के साथ गई थी और तब मैंने अपने मम्मी का हाथ छोड़ दिया था. तो ऐसे कई सारी कहानियाँ मेरे आँखों के सामने तैरती थी

इतनी कम उम्र में ही इतने सारे जीवन के हालतों को देखना जो इतने दर्दनाक होती है लेकिन उससे वे अपने जीवन में कितने सारे सवालो, विचारो को बना रहे है जो उनके जीवन को बनाके की कोशिश कर रहा है. बस यही ख्वाइश और दुवा करती हु इन बच्चो के लिए की वो अपने जीवन को बेहतर बनाये और ख़ुशीयो से सजाये.

(* नाम बदले हुए है)

परीक्षा और वो....................................

कभी किसी ने बताया ही नहीं की पढाई कैसे की जाती है? कभी लगता है की क्या जरुरी है बताना की पढाई कैसे करनी चाहिए. हर  कोई अपने तरीके से पढ़ लिख सकता है. लेकिन लगता है की जब तक स्कूल में है वहा पर तक ठीक है की पढो या नहीं पढो. वैसे भी कक्षा आठवी तक तो पास किया जाता ही है तो तब तक तो चलेगा, लेकिन जब हम हम अगले कक्षा तक जा रहे तो पढ़ना कैसे है उसके बारे में बात की जा सकती है और आगे की पढने के लिए भी बहुत मुश्किलों का सामना बच्चो को करना पड़ता है. लेकिन तब तक बहुत देरी हो जाती है तो उस पढाई के कौशल्य के बारे में बात करना मतलब कुत्ते के पूछ में पाईप डालने जैसे हो जाता है.

मुझे याद है की मेरे एक स्कूल के हेडमास्टर कह रहे थे अपने स्कूल के बच्चे के बारे में, की इन बच्चो का भविष्य काफी कठिन होगा क्योंकि उनके लिखाई-पढाई के उपर ध्यान नहीं दिया गया. जो की सच है. और मुझे लगता है इस वजह से इन बच्चो की जिदंगी में आगे बढ़ने में मुश्किलें आ सकती है. लेकिन अगर उन्हें ढंग का मार्गदर्शन मिले तो कुछ बात बने.

जब अपने साथ के दोस्तों को देखती हु की वे पढाई-लिखाई कैसे करते है तो बहुत हैरानी होकर उन्हें देखती हु, कभी-कभी पूछ भी लेते हु की कैसे पढ़ लेते हो, तो वे कहते है की वे कर लेते है. इस तरह से बोलना की कर लेते है वाकई में मुझे बहुत ही आश्चर्य लगता है. क्योंकि मेरे लिए बहुत ही मुश्किल होने लगता है. कई लोग घंटो-घंटो एक किताब पढ़े लेते है वो भी एक जगह बैठते हुए मै बैठू तो मेरे नजर किताब के अलावा भी कई सारे जगहों पर होती है और उसके साथ दिमाग में भी कई सारे विचार तैरते रहते है. जानती हु मै बहुत कुछ कर नहीं सकती लेकिन जीतना भी थोड़ा करुँगी वो मेरे लिए जरुरी है और मै अपने आप को भी इशारा भी दे रही हु. 

पढाई, लिखाई exam के वजह से काफी erritation होती है. वो अच्छी लगती नहीं. अपने सर से कह रही थी की यह परिक्षाए होनी ही नहीं चाहिए. परीक्षा के नाम से ऐसे लगता है की हमारे ज्ञान को तोला जा रहा है, वो भी अंको या ग्रेड से. जिससे पता चलता है की कौन कितना होशियार/इंटेलीजेंट है.

हम बात करते है की, व्यक्ती को motivate करो, उसकी प्रशंसा करो, लेकिन उसका मतलब यह नहीं की व्यक्ती के ज्ञान, क्षमता के उपर उसे तोला जाए. क्योंकि जिसे कम मार्क्स आये इसे कितना बुरा लगता होगा. अंदर ही अंदर उसे कितना दर्द होता है वो व्यक्ती ही जाने. अपने जीवन में मुझे उन दौर से गुजरना पडा. अपनी पढाई-लिखाई के वजह से मुझे अपने आप को बुरा महसूस करती थी, कभी कभी मेरे दोस्त मुझसे दूर भागते थे. क्योंकि मै पढाई में अच्छी नहीं, या मै होशियार नहीं हु या मुझे अच्छी मराठी बोलनी नहीं आती, या फिर मै झोपडपट्टी में रहती हु या फिर मेरे पास अच्छे कपडे नहीं है ऐसे कई सारे लेबलिंग से जाना पडा. तो फिर लगता है की, व्यक्ति के उसके बाहरी चीज पर देखा जाता है की वो कितना अच्छा है या नहीं है. लेकिन उसके अंदर गुणों को देखने के लिए किसी ने कोशिश ही नहीं की,. आज शायद इस तरह से चीजे मेरे साथ नहीं होती अगर होती भी है तो उसे अनदेखा कर लेते है. क्योंकि अब अपने अंदर वो आत्मविश्वास, अपने प्रती प्यार है. इस लिए मुझे कोई उचा-नीचा देखने की कितनी भी कोशिश करे तब पर भी मै गिरुगी नहीं. उसके सिवाय ऐसा भी सोचती हु की जो लोग ऐसा सोचते है उनके सोचने का तरिका ही ऐसा हो या उनके जीवन ही इस तरह से बीता हो जिस वजह से वे ऐसा सोचते है.










Saturday, 27 September 2014

टीचर के घर बिताये हुए वो ढाई घंटे................................

कल अपने टीचर के घर बिताये हुए वो ढाई घंटे मुझे याद रहेगे. अपने जीवन के २५ साल में पहली बार अपने किसी टीचर के घर जाने का मौक़ा मिला. एक अलग सा ही अहसास था उनके घरपर. उनके घर उनका पूरा परिवार याने दो बच्चे, सास-ससुर-पती ऐसा पूरा परिवार है उसके साथ-साथ delhi में उनके दादी-दादा ससुर भी है.

अब जाने का उद्देश यह था की मैम ने हमें दावत पर बुलाया था और उसके साथ gc भी थी. हमें इसलिए उनके घर जाने मिला क्योंकि हम सारे स्टूडेंट्स फील्ड वर्क के पिए उनके under superwise थे. मैम के साथ हम सारे सात स्टूडेंट्स एक अलग ऐसा रिश्ता था. हर एक स्टूडेंट्स के लिए उनकी अहमियत थी. जब भी gc में हम बाते करते थे तो ऐसे बाते कर रहे हो जैसे की गप्पे लड़ाने बैठे हो. लगता ही नहीं था की उनके साथ कोई फॉर्मल मीटिंग हो रही हो. हमने ऐसे कोई भी फिल्ड वर्क के बारे में या कीसी reading की बाते नहीं की वो इसलिए क्योंकि हम खाने का इतना स्वाद ले रहे थे और उसके साथ डेढ़ सारी बाते कर रहे थे. मैम के बच्चे भी थे उस वक्त. उनकी बच्चो ने बाते भी कुछ और कुछ बालगीतो के एक्टिविटी में भाग लिया था इवन हमारे मैम भी तो थी! अच्छा लगा इस तरह का एकसाथ आना.

इस तरह से मैम ने हमें बुलाया हम सबके लिए याने तो मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी. यहाँ तक अपने टीचर के साथ रिश्ता होना याने की बहुत आदर्शवादी रिश्ता एक स्टूडेंट्स और टीचर के जैसा. इस तरह से रिश्ता बहुत ही कम होते है अपने स्कूल से लेकर हायर एजुकेशन तक अब तक बहुत कम टीचर हमें मिलते है जिनके साथ हम स्टूडेंट्स खुलकर बाते, वक्त बिता कर पाते है.

मुझे हमेशा लगता है की एक टीचर और स्टूडेंट्स का रिश्ता ऐसा हो जिसमे अपने मन की बात स्टूडेट्स से अपने टीचर तक पहुचे ताकी टीचर आगे कुछ तो या फिर ना भी करे तब पर भी अपने मन की बात बताने का पूरा मौक़ा हो स्टूडेंट्स को.

आज मैम को ना अब तक टीचर के रूप में देखा उसके साथ-साथ एक मा का रूप देखने मिला. कितनी समझदारी है उन्हें अपने बच्चो को के प्रती जो प्यार, जिम्मेदारी भी बहुत खुबसूरत तरीके से निभा रहे  है.


आज तो हम लोग कई सारी बाते ऐसे कर रहे थे अपने टीचर के सामने जो की हम स्टूडेंट अपने बीचो-बीचो करते है. लेकिन उनके घर वो पूरा मौक़ा था अपनी बाते खुलकर कहने का. मैम के लिए भी तो कितना आश्चर्य रहा होगा की हम स्टूडेंट इतनी सारी बाते कितने सारे चीजो के उपर करते है. चलो अच्छा ही है की स्टूडेंट्स की बाते सुनने मिलती है उन्हें. 

Sunday, 21 September 2014

जीवन एक कहानी है.......................................

इस तीन दिन के प्ले conferance में कई सारे लोगो से मुलाक़ात हुई. बहुत सारी बातचीत हुई, सवाल-जवाब हुए. जिनकी अपनी संस्था है वे बच्चो के साथ अपना एक एजेंडा ले जाते हुए काम कर रहे है. अच्छा लगता है ऐसे लोगो से मिलने के बाद. ऐसे लगता है की उन्ही के संस्था में काम करना चाहिए. लेकिन अपना इंटरेस्ट ही मुझे आगे ले जाएगा. 

मै सोच रही थी, काउंसलिंग में आने के पहले मेरी मुलाकत, कई सारे लोगो से हुई थी जैसे की मेरे नेबर हो या दोस्त या फिल्ड में जाने के बाद जो लोग मिलते थे वो. लेकिन उन सारी लोगो की अगर मै कहानी लिखने जाऊ तो पता नहीं कितनी सारी कहानियो की किताब बनेगी. उस एक-एक करके बातो को लिखना उसका अपना मजा होगा जैसे की नौकरानी के डायरी में लिखे हुए पन्नो की तरह.



ऐसा लगता है की जीवन एक कहानी है. अपने जीवन की हर बाते एक कहानी का रूपधारण करती है. उस जीवन की कहनियों में भी कहानियाँ बनती जाती है. वो ऐसे ही आगे बढ़ते जाती है. वो कभीं नहीं थमती. कहानी के कई रूप होते है. कुछ कहानियाँ सच्ची होती है तो कुछ देखी, अनकही, झूठ, गंभीर, परेशान करने वाली होती है. उसके पात्र एक वक्त में कई सारे होते है. कुछ कहानिया बदलती रहती है तो कुछ हालतों से बदलती रहती है. वैसे तो कहानियों का बदलना उसका गुणधर्म होता है. कहानी के कलाकार कई सारे होते है. कुछ कहनियों में एक ही कलाकर होता है. इस कहानी को रंग लाने के लिए कई सारे बातों को डाला जाता है. कुछ कहानी एक दिन की होती है तो कुछ कहानिया एकदूसरे से जुडी हुई होती है. कुछ कहानी से सदियों से बनी हुई होती है तो जिसे ना कोई बदल सकता है पर कुछ लोग उसमे और कुछ बाते डालकर उसे बदलते रहते है. कुछ कहानियाँ बनी हुई होती है तो कुछ कहानियों को बनाया जाता है. इन कहानियों को समझने के लिए उसे सुने ताकि उन कहानियों को समझ पाये. और हो सके तो उस ही वक्त लिखा जा सकता है. ताकि उस कहानीको शुरू से समझ पाए और उसका सीक्वेंस लगातार देखा जा सकता है. लेकिन वही सीक्वेंस को बीच में टूट भीं जाता है तो उस व्यक्ति के जीवन को और एक कहानी बन जाती है. फिर और एक मोड़ के लेते हुए वो आगे बढती है. इस कहानी के पात्र बड़े मजेदार होते है कोई बहुत सुंदर, कोई हसाऊ, पढाऊ, बकने वाला, कोई गुस्सा करनेवाला. कहानी तो कहानी होती है उसमे अपनी-अपनी बाते होती है.

Monday, 23 June 2014

मेरे दो दिन का नासिक की ट्रिप काफी अच्छा रहा अपने परिवार के साथ. लेकिन मै बर्थडे सेलिब्रेशन पूरा नहीं देख पाई क्योंकि मै पोहची लेट. पर कोई बात नहीं, थोड़ा बहुत वक्त बिता पाए होटल में. उसके साथ-साथ सजावट की फोटो भी खिची और एक अच्छे खाने का आस्वाद भी लीया. उसके दुसरे ही दिन बाद हम अपने परिवार के साथ इगतपुरी, ग्लोबल मैडिटेशन सेंटर में चले गये थे. बड़ी खुबसूरत जगह है. काफी बड़ा पहाड़ भी है वहा. बहुत मस्त हवा के झोके भी मुझे छु रहे थे. वहा पर एक सेवक से मुलाक़ात भी हुई. वे थे मध्य-प्रदेश के रहने वाले, उन्होंने हमें सेंटर की सैर कराई. वो कह रहे थे की एक ही वक्त में, करीबन ढाई सो लोग मैडिटेशन कर सकते है. १० दिन और ४५ दिन के मैडिटेशन के लिए अलग-अलग जगह साधक (मेडिटेटर) को दि जाती है. उसके साथ-साथ महिला और पुरुषों के लिए अलग-अलग हॉल तथा कमरे और खाने-पीने मी व्यवस्था है. एक चीज इस सेंटर में अलग लगी की उसमे लोग जब साधक ध्यान साधना करने जाते है तो उनके एक छोटासा कमरा दे दिया जाता है जिसमे वो लोग एकदूसरे को देख भी नहीं पाते. और वो कमरा भी किसी इमारत या घर में नहीं होती बल्कि एक भव्य घुमट के आकार जैसा बनायी हुई वास्तु है. वो आगे कह रहे थे की, वहापर इस तरह की शांति होती है जहापर अपने छोटेसे इस घडी के काटो की आवाज तक सुनाई देती है जो आमतौर पर हम सुन नहीं सकते. जिस सेवक से हमारी मुलाक़ात हो रही थी वे तो खुद ८० साल के है, जिनको मै देखकर चौक गई थी वो तो एकदम चल-फिर रहे थे और एक हमारे  ही रिश्तेदार में एक दादाजी है जो करीबन ९० साल है जो आज खुद भंतेजी है और वे वहा अपने परिवार से अलिप्त विहारे में ही रहते है.


लग रहा था की फिर एक बार मैडिटेशन की ओर अपने आप को बढ़ाने की जरूरत है क्योंकि अपने रोजमर्रा जिंदगी को बेहतर, सुदृढ रख सकते है. जिसमे अपने आप के जीवन में क्या पाना है वो तो नहीं जानते लेकिन बहुत सारा जीने की ख्वाइश पूरी हो जायेगी.