Sunday, 21 September 2014

जीवन एक कहानी है.......................................

इस तीन दिन के प्ले conferance में कई सारे लोगो से मुलाक़ात हुई. बहुत सारी बातचीत हुई, सवाल-जवाब हुए. जिनकी अपनी संस्था है वे बच्चो के साथ अपना एक एजेंडा ले जाते हुए काम कर रहे है. अच्छा लगता है ऐसे लोगो से मिलने के बाद. ऐसे लगता है की उन्ही के संस्था में काम करना चाहिए. लेकिन अपना इंटरेस्ट ही मुझे आगे ले जाएगा. 

मै सोच रही थी, काउंसलिंग में आने के पहले मेरी मुलाकत, कई सारे लोगो से हुई थी जैसे की मेरे नेबर हो या दोस्त या फिल्ड में जाने के बाद जो लोग मिलते थे वो. लेकिन उन सारी लोगो की अगर मै कहानी लिखने जाऊ तो पता नहीं कितनी सारी कहानियो की किताब बनेगी. उस एक-एक करके बातो को लिखना उसका अपना मजा होगा जैसे की नौकरानी के डायरी में लिखे हुए पन्नो की तरह.



ऐसा लगता है की जीवन एक कहानी है. अपने जीवन की हर बाते एक कहानी का रूपधारण करती है. उस जीवन की कहनियों में भी कहानियाँ बनती जाती है. वो ऐसे ही आगे बढ़ते जाती है. वो कभीं नहीं थमती. कहानी के कई रूप होते है. कुछ कहानियाँ सच्ची होती है तो कुछ देखी, अनकही, झूठ, गंभीर, परेशान करने वाली होती है. उसके पात्र एक वक्त में कई सारे होते है. कुछ कहानिया बदलती रहती है तो कुछ हालतों से बदलती रहती है. वैसे तो कहानियों का बदलना उसका गुणधर्म होता है. कहानी के कलाकार कई सारे होते है. कुछ कहनियों में एक ही कलाकर होता है. इस कहानी को रंग लाने के लिए कई सारे बातों को डाला जाता है. कुछ कहानी एक दिन की होती है तो कुछ कहानिया एकदूसरे से जुडी हुई होती है. कुछ कहानी से सदियों से बनी हुई होती है तो जिसे ना कोई बदल सकता है पर कुछ लोग उसमे और कुछ बाते डालकर उसे बदलते रहते है. कुछ कहानियाँ बनी हुई होती है तो कुछ कहानियों को बनाया जाता है. इन कहानियों को समझने के लिए उसे सुने ताकि उन कहानियों को समझ पाये. और हो सके तो उस ही वक्त लिखा जा सकता है. ताकि उस कहानीको शुरू से समझ पाए और उसका सीक्वेंस लगातार देखा जा सकता है. लेकिन वही सीक्वेंस को बीच में टूट भीं जाता है तो उस व्यक्ति के जीवन को और एक कहानी बन जाती है. फिर और एक मोड़ के लेते हुए वो आगे बढती है. इस कहानी के पात्र बड़े मजेदार होते है कोई बहुत सुंदर, कोई हसाऊ, पढाऊ, बकने वाला, कोई गुस्सा करनेवाला. कहानी तो कहानी होती है उसमे अपनी-अपनी बाते होती है.

Monday, 23 June 2014

मेरे दो दिन का नासिक की ट्रिप काफी अच्छा रहा अपने परिवार के साथ. लेकिन मै बर्थडे सेलिब्रेशन पूरा नहीं देख पाई क्योंकि मै पोहची लेट. पर कोई बात नहीं, थोड़ा बहुत वक्त बिता पाए होटल में. उसके साथ-साथ सजावट की फोटो भी खिची और एक अच्छे खाने का आस्वाद भी लीया. उसके दुसरे ही दिन बाद हम अपने परिवार के साथ इगतपुरी, ग्लोबल मैडिटेशन सेंटर में चले गये थे. बड़ी खुबसूरत जगह है. काफी बड़ा पहाड़ भी है वहा. बहुत मस्त हवा के झोके भी मुझे छु रहे थे. वहा पर एक सेवक से मुलाक़ात भी हुई. वे थे मध्य-प्रदेश के रहने वाले, उन्होंने हमें सेंटर की सैर कराई. वो कह रहे थे की एक ही वक्त में, करीबन ढाई सो लोग मैडिटेशन कर सकते है. १० दिन और ४५ दिन के मैडिटेशन के लिए अलग-अलग जगह साधक (मेडिटेटर) को दि जाती है. उसके साथ-साथ महिला और पुरुषों के लिए अलग-अलग हॉल तथा कमरे और खाने-पीने मी व्यवस्था है. एक चीज इस सेंटर में अलग लगी की उसमे लोग जब साधक ध्यान साधना करने जाते है तो उनके एक छोटासा कमरा दे दिया जाता है जिसमे वो लोग एकदूसरे को देख भी नहीं पाते. और वो कमरा भी किसी इमारत या घर में नहीं होती बल्कि एक भव्य घुमट के आकार जैसा बनायी हुई वास्तु है. वो आगे कह रहे थे की, वहापर इस तरह की शांति होती है जहापर अपने छोटेसे इस घडी के काटो की आवाज तक सुनाई देती है जो आमतौर पर हम सुन नहीं सकते. जिस सेवक से हमारी मुलाक़ात हो रही थी वे तो खुद ८० साल के है, जिनको मै देखकर चौक गई थी वो तो एकदम चल-फिर रहे थे और एक हमारे  ही रिश्तेदार में एक दादाजी है जो करीबन ९० साल है जो आज खुद भंतेजी है और वे वहा अपने परिवार से अलिप्त विहारे में ही रहते है.


लग रहा था की फिर एक बार मैडिटेशन की ओर अपने आप को बढ़ाने की जरूरत है क्योंकि अपने रोजमर्रा जिंदगी को बेहतर, सुदृढ रख सकते है. जिसमे अपने आप के जीवन में क्या पाना है वो तो नहीं जानते लेकिन बहुत सारा जीने की ख्वाइश पूरी हो जायेगी. 

Friday, 30 May 2014

आज कई दिनों के बाद टाइपिंग कर रही हु लेकिन बाये हाथ की कलाई दुखने लगी  है, पता नही क्यों शायद बहुत दिनों बाद लिख रही हु. टाइपिंग करने की आदत छुट गयी थी इसलिए इतनी दिक्कत हो रही थी. लेकिन इस हाथ को फिर एक बार लैपटॉप के कीबोर्ड पर लाने की जरुरत है.

इन दिनों की छुट्टिया काफी समय गर्मी को कम करने में चली गई. तो गर्मी को को कम करने के लिए ठंडा छास, फर्श को ठन्डे पाणी से पोछना, दिन में दो बार नहाना, शाम को रेसकोर्स की तरफ टहलने जाना यही इन्ही बातो में वक्त बीत रहा है. बहुत कुछ करने को मन था ही नहीं, थोड़ा बहुत पढ़ पाए और कुछ-कुछ लिख पाई अपने डायरी/ब्लॉग पर. दोपहर की जलती हुई गर्मी में तीन-चार घंटे तक फिल्मे देख पाए जैसे की अभिमान, गैम्बलर, मदहोशी, यादें, और अन्य कई सारी फिल्मे देखी जो अपने कॉलेज के समय में नहीं देख पाए. लग रहा था की अपना टाइम काफी बर्बाद कर रही हु लेकिन अपने कुछ टीचर कह रहे थे की, इस तरह का भी वक्त बिताने की जरुरत है. उसी के साथ हर रविवार को कितनी सारी शादिया में भी जाने का मौक़ा मिला, कई सारे रिश्तेदारों से मुलाक़ात हुई जिन्हें जानते थे लेकिन उन्हें बरसो बाद मिल रहे थे और जिन्हें जानते नहीं थे उन्हें मिलने का मौक़ा मिला. हसी के ठहाको में शादी के घर में वक्त बीतता था.


अभी बस राह देख रहे है की कॉलेज कब शुरू होता है ताकि अपने रोजमर्रा जिंदगी को सही पटरी पर ला सके. अपने साथी भी शायद ऐसा ही कुछ सोच रहे होगे लेकिन लगता नहीं क्योंकि कई सारे स्टूडेंट्स अपने घरवालो को छोड़कर टिस में पढने आये है तो बेशख नहीं चाहेंगे की छुटिया जल्दी खत्म हो. लेकिन अपने साथियो से तो यही कहना चाहूंगी की वे अब के बचे हुए कुछ और दिन है उसे ख़ुशी से अपने परिवार, दोस्त, पडोसी, टीचर्स के साथ बिताये और जल्द ही अपने टिस में सही सलामत लौट आये. HAPPY HOLIDAY TO MY ALL FRIENDS. 

Friday, 16 May 2014

रेसकोर्स का सफ़र....................................


रेसकोर्स का नाम लिया तो आखों के सामने घोड़े आते है लेकिन अगर कभी शाम के वक्त घुमने जाए तो लोग भी वहापर दौड़ने, चलने या फिर युही टहलने आ जाते है.

बहुत सालो बाद मैंने रेसकोर्स का चेहरा देखा. सोचा की चलो जाते है चलने याने की वॉकिंग करने. वोकिंग शब्द तो बहुत ही बड़ा लगता है सुनने के लिए. चलते-चलते लगा की, मैडिटेशन करना चाहिए. कुछ दिन पहले अखबार में मैंने एक किताब के बारे में पढ़ा था. उस किताब का नाम है, “वॉकिंग मैडिटेशन” सूना था. वो किताब कहती है की चलते-चलते भी मैडिटेशन कर सकते है. तो सोचा की चलो करते है लेकिन ज्यादा देर तक अपने श्वास पर नियंत्रण नही रख पाई, क्योंकि बीच में ही मै भूल गई थी, और हम सारे जानते ही है की मनुष्य के मन के कितने सारे विचार, कल्पनाये तैरते रहते है. इसलिए निरंतर मैडिटेशन करना मुश्किल होता है.

रेसकोर्स में बूढ़े से लेकर जवान तक लोग आते है. युवाओ की बात करे तो वो भागते है या फोन पर बात करते है या फिर वे चलते-चलते गाने सुनते है उसके साथ भी बुजुर्ग भी चलना ही सही समझते है. इन सबमे मुझे एक बात ऐसी लग रही थी की हर कोई अपने उद्देश से रेसकोर्स में आ रहां था. ज्यादा करके जो लोग काफी अपने आरोग्य को लेकर चिंतित होते है या फिर डॉक्टर ने सलाह दि होती है. लेकिन मेरा उद्देश यही था की, मुझे घर से बाहर निकलना था क्योंकि घर पर बैठे-बैठे बोरियत से महसूस हो रही थी. रेसकोर्स में आने के बाद लगा की इतनी सुंदर जगह मेरे घर के पास होने की बावजूद मै उसे देखती नहीं. लोग कहा-कहा से आते है, लेकिन मै नजदीक होने के बावजूद भी नहीं जाते. माँ कहती है पास जो चीजे होती है उनकी तरफ हम ध्यान नहीं देते तो यही सच है. यह जगह बॉलीवुड में भी तो शूटिंग के लिए बड़े पैमाने में इस्तेमाल होती है.


इस जगह पर गरीब से लेकर अमीरों तक लोग यहापर चलने या दौड़ने आते है. यहापर किसी भी तरह का मुझे भेदभाव नहीं नजर नहीं आया. रेसकोर्स में आने के लिए किसी को भी पाबंदी नहीं होती. हर कोई वहा के तेज हवा का आस्वाद ले सकता है. 

Wednesday, 14 May 2014

टिस कि सीख जारी है.........................

मैंने अब तक अपने स्कूल में क्या सिखा? अगर यह सवाल कहा जाए तो इसके पहले मै कहूँगी की इस कॉलेज में एडमिशन हुआ है यही बड़ी बात है. दूसरी बात यह लगती है की, कितने सारे लोग मिले मुझे अलग-अलग तरीके के. बहुत अच्छे लोग है. हमारे क्लास में तो सारी लडकिया ही है. अब तक ८ वी से १० तक लडकियों के स्कूल में पढी उसके बाद, ११ वी भी लडकियों की स्कूल और फिर सोशल वर्क भी बड़े पैमाने पर लडकिया थी कुछ ही लड़के थे और अब क्लास में गिने-चुने लड़के है बाकी सारी लडकिया. यहाँ तक की हमारी फैकल्टी में एक ही मेल टीचर है बाकी सारे औरते टीचर्स है. पता नहीं मेरा औरतो के साथ कुछ तो रिश्ता है जो अब तक वही मेरे आसपास ज्यादा करके रहती है. हां लेकिन फेलोशीप में जिनके साथ रहती थी वहापर हम सिर्फ दो ही लडकिया थी एक मै और दूसरी अंकिता. बाकी चार लड़के और मेरे पीएल.

लेकिन छोडो इन लडकियो की बाते. आगे लिखते है की, टिस में आके मुझे बहुत कुछ सिखने मिला ज्यादा करके मेरे कोर्स के बारे में कई सारी जानकारी मुझे मिली. जिससे अपने कोर्स को समझने के लिए अच्छा खासा मौक़ा मिला. इस कोर्स की एक चीज मुझे सबसे ज्यादा अच्छी लगती है इसमे दो चीजे है एक तो मुझे परीक्षा को ज्यादा प्रेशर नहीं है क्योंकि हमें ज्यादा करके मार्क्स assignment, क्लास पार्टिसिपेशन इन सबमे मार्क्स मिल जाते है और कुछ एक छोटीसी परीक्षा हो जाती है. जिसमे मार्क्स मिलना आसान हो जाता है. और दूसरी चीज इस कोर्स की,  यह की हमें क्लास में करने के लिए डेमो भी होता था जिसमे हमारे कौशल्यो के विकास होता था. और उसके साथ हमें फिल्ड वर्क भी होता वह भी दो दिन का. जिसमे तो नाकी मुझे अपने कौश्ल्यो और ज्ञान का इस्तेमाल होता था उसके साथ कई सारी रियलिटी पता चल रही थी, अपने विचारों के साथ-साथ कई भावनों के उतार-चढाव होते थे.


कोर्स का सेकंड सेमिस्टर काफी बिजी था, बहुत कुछ मैंने सिखा था. लेकिन वक्त के अभाव से पढ़ नहीं पाए. लेकिन कोई बात नहीं जानती तो हु? बस पढ़ना बाकी है. एक बात अपने लिए हमेशा के लिए रखना चाहती हु की, मै हमेशा विद्यार्थी बनकर रहना चाहती हु. क्योंकि पढने, सिखने और लिखने की चाव बढती रहे, जिससे अपने विकास बढ़ता रहे जो कभी ना थमेगा. 

Friday, 9 May 2014

आजकल research या संशोधन के पीछे भागदोड रहे है. इसलिए अपने रिसर्च के मार्गदर्शक के साथ अच्छा वक्त बीत रहा है. जिस तरह से वे मदद या मार्गदर्शन अपने स्टूडेंट्स को कर रहे है उसी के साथ मुझे कई सारे बाते दिखाई दे रही है. उनके बोलने का तरिका मेरे लिए बहुत ही यादगार रहेगा. क्योकि जिस तरह से वे बात करते है वो मुझे इतना बहुत अच्छा लगता है. मुझे ऐसे लग रहा है की, मै भी उनकी तरह बोलना सीखू. अपने शिक्षक की तार्किक भाषा और उसके साथ सीधी-साधी भाषा स्टूडेंट्स के साथ इस्तेमाल करते है. 

उनके बारे में एक बात अच्छी लगती है की, वे स्टूडेंट के कमियों को समझ लेते है और उसपर वे काम करते है. कल तो मै कितनी अंचभित हो गई थी जब उन्होंने कहा की मै उनके खुर्सी पर बैठ जाऊ. लेकिन मेरे लिए कितना अजीब था तब पर भी वे मुझे वो बार-बार कह रहे थे पर मुझसे हुआ ही नहीं. ऐसे वक्त में कितनी शर्म आ रही थी. मेरी तो हिम्मत ही नहीं हो रही थी की मै उस खुर्सी पर जाकर बैठू और आखिर तक मै बैठ नहीं पाई. लेकिन उसी वक्त अपने स्कूल के दिन याद आये जहापर हम मै से कुछ दोस्त जब हमारे गुरूजी कक्षा मै नहीं होते थे तब हम  सारे स्टूडेंट्स गुरूजी के खुर्सी पर बैठने की कोशिश करते थे. तब मजा आता था. लेकिन इस बार तो खुद शिष्य कह रहे थे तब पर भी नहीं बैठ पाए.

इन सारी बातो से एक चीज लग रही थी, एक गुरु-शिष्य का नाता एकदम भयमुक्त होने की जरुरत है. ताकि उन दोनों में संवाद बना रहे, दूसरी बात शिष्य में कोई भी डर, झिझक ना हो ताकी दिमाग में आये हुए हर एक शंका, सवालों को वो पूछे जिससे ज्ञान की वृद्धि हो. अब बात रही की, स्टूडेंट्स को खुर्सी पर बैठना चाहिए या नहीं तो वो हर स्टूडेंट्स के उपर निर्भर रहेगा. बाकी हर कोई अपने इच्छा के अनुसार रह सकता है जैसे की शिष्य के खुर्सी के उपर बैठना है या नहीं. 

Thursday, 3 April 2014

सुपारी v/s नाती


सुपारी चे नाव घेताच तीची टनक बाजू दिसून येते. तशीच नाती ही टनक असतात. कधी ती तुटली की जोडली जात नाही जर जोडली तर टूटने ही मुश्किल असतात. नात्यांचा गुंता सुटतात तसे सुटत नाही. तश्याच त्या सुपारीच्या कार्यक्रमाचा सोहळा होता.
सुपारीचा कार्यक्रम म्हणजे, मुली व मुला कड़ील पाहुणे मंडळी मुलीच्या घरी एकत्र येतात. तेथे मुला-मुलिकड़ील लोकांची ओळख करतात. एकमेकांची ओळख, लग्नाच्या, देण्या-घेण्याच्या गोष्टी जाहिर केल्या जातात. ते झाले की मुलाचा व मुलीचा मामा पाच सुपारी दगडाने किंवा वरवंटयाने फोडतात. मग मुलीला नारळ, तांदूळ, मुलाक़डची साडी देतात तसेच हळद-कुंकू लावतात. त्याचबरोबर मिठाईने एकमेकांचे गोड तोंड केले जाते. त्यानंतर जेवणाचा कार्यक्रम होता. अश्यारितीने सुपारिचा कार्यकृम पार पाडला जातो.
कालच माझ्या मामाच्या मुलाचा सुपरिचा कार्यकृम होता तो सुद्धा मुलीच्या मंगळूर गावी. मग आह्मी पूर्ण सगळी माणस गावी गेलो. गावी पोहचल्या क्षणी आह्मला त्यांच्या घरातील लोकानी बसण्याची व्यवस्था केली. थोडयावेळाने एक वडिलधारक व्यक्ति आले, ते थोडावेळ बसल्यानंतर त्यांच्या घरातील लोकांना ओरडू लागले होते की आमच्या पाहुण्यासंगे बोलायला कोण ही नाही. त्यानंतर त्यांनी बाहेर सुपरिचा कार्यकृम करण्यास ठरविले. परंतु आमच्या पाहुण्यानी नकार दिला असे म्हणून की, “चवाठ्यावर का करायचे” तेथील मुलीची आई म्हणाली की, “नवीन घर केले आहे, त्याची पूजा झाल्याशिवाय कसे काय करता येईल कार्यकृम” आमच्या ही बायका म्हणाल्या, “हो बरोबर आहे”. परंतु त्याच घरात आह्मी दुपारचे जेवण केले, जेवल्यानंतर आमच्यातील दूसरी बाई म्हणाली की, हे काय सुपारिचा कार्यकृम नाही केला पण जेवण कसे काय केले?”
एकमेकांचे चुका काढने किती पटकन जमते माणसाला. आपण म्हणतो की कशाला चुका काढतो पण येतेच ते, कारण स्वताचे खरे करने हे प्रत्येकाला हवे असते.
नेमकी सुपारीची वेळ आली अन मुला-मुलीकड़ील मोठे व्यक्ती त्यांचे खाजगी गोष्टी लग्नकरण्याबाबत बोलत होते. पण दोघांमधे जेव्हा बाचाबाची सुरु झाली तेव्हा मुली-मुलाकडील पाहुणे मंडळी बोलू लागली. अन झाले असे की जो तो आपला मुद्दा अगदी ठणकावून सांगत होता की कसे लग्न झाले पाहिजे, कुठे झाले पाहिजे, खर्च-पाण्याचा प्रश्न इत्यादि गोष्टीवर अगदी जोरात चर्चा सुरु झाली, अन थोड्यावेळासाठी सगळे विसरून गेले होते की ज्या सोहळयासाठी आले आहेत तो पूर्ण करायचे परंतु म्हणतात की घरातील भांड्याला भांडे लागते. मग शेवटी दोन्ही परिवार एकच विचारविनिमय करून शेवटी सुपारी फुटली. म्हणूनच वाटते की नाती ही ह्या सुपारीसारखी कठिन तेवढीच भावनिक व जिव्हाळयाची असतात.
त्याच वेळेस तिथे एक आजोबा ही भेटले, वय त्यांचे एकशे सहा वर्षे. कोणाला तर माहीतही नसेल की त्यांचा जन्म कधी झाला असेल. त्यांचे बोलने अगदी स्पष्ट होते, त्यांना माहीत होते की काय चालु आहे, दूसरी अगदी वैशिष्टयाची बाब म्हणजे त्यांना नीट असे ऐकु येत होते आणि थोडेफार दिसत ही होते, इतके एक शतक जीवन जगणारे व्यक्ति खुपच कमी असतात. त्यांना पाहून जगायला काल एक अर्थ मिळत होता. खुप बारे वाटले, की इतके म्हातारे असूनही त्यांची ‍ ‌‌‍ज्ञानेद्रिये अगदी छान चालत होती, मग हे तरुणपण कितीतरी पटीने वेगाने चालले पाहिजे कारण त्यामधे कितीतरी गोष्टी आयुष्यात करण्यासारख्या आहेत. मग तर पुढे चालले पाहिजे बाकि सगळ्या गोष्टी मागे सोडून.

31st March 2014