Wednesday, 23 October 2013

सफर उदवाडा का.......................................

मुझे शेठ और बाई के साथ जब मौक़ा मिला उनके गाव “उद्वाड़ा” जाने के लिए तो मै काफी खुश थी| क्योंकि मुझे कुछ नया देखने मिलने वाला है| सबसे पहले मेरे लिए यह बात काफी आकर्षित करती थी की मुझे गाव देखने का मौका मिलने वाला है| बरसों साल पहले वहा पर पारसी ही लोग रहते थे, आज भी कुछ घर है| लेकिन कईयो ने अपने घर को बेचकर शहर में चले गए| अब वहापर जैन, गुजराती लोग रहते है|
जाने से पहले आखो में गाव की यह छवि थी की जिसमे मुझे लगा की दूर-दूर तक घर होगे, वहा के घर काफी पुराने के किस्म के होगे लेकिन जाने के बाद देखा की, उनके सामने, बगल में भी घर है| वैसे तो शेठ-बाई कभी-कभी गाव जाकर देखते है लेकिन उन्होंने एक औरत भी रखी है जो हर दिन घर की सफाई करके जाती है| उसे वे “गंगा” कहते है, उनका नाम गंगूबाई है| उन्हें चार बच्चे है| उनके बच्चे के भी बच्चे है| बाई कह रह थी की गंगुबाई की माताजी वहापर आती थी, उनके गुजरने के बाद गंगुबाई ने घर संभालने का काम लिया|

ट्रेन का सफर आते-जाते वक्त काफी अच्छा रहा| बाई-शेठ ने काफी बातचीत की| वे मुझे हर तरह की बाते बता रहे थे जैसे उनके गाव, धर्म, लोग इत्यादि| इसलिए सफर में बोरियत सी महसूस नहीं हो रही थी| उस बिच खाने-पिने की चीजे बेचनेवाले भी लोग थे| मेरे सिट के सामने ही एक औरत थी| वो अपने पती से काफी नाराज थी| इसलिए वो मुम्बई में अपने भाई के घर आई थी भाई के घर से निकलने के बाद उसकी ट्रेन प्लेटफार्म से छुट गई थी इसलिए उसे दूसरी ट्रेन पकड़ने पड़ी| उसके भाई ने उसे फ़ोन किया की वो कहा है लेकिन उसे विश्वास नहीं हो रहा था की उसकी बहन गाडी में बैठी है| इसलिए उस औरत ने मुझे उसका मोबाइल थमाते हुए मुझे कहने के लिए कहा| काफी अजीब लगा मुझे फोनपर बात करते हुए| बिच ही बिच वो गाडियों का वक़्त, घासलेट का बढ़ता हुआ भाव इत्यादि की बात कर रही थी| ऐसे लग रहा था की उसे बहुत कुछ बोलना था लेकिन मुझे ऐसा कुछ मौक़ा ना मिला| गाडी में दो बड़े बच्चे डफली-खंजेरी भी बजा रहे थे| अच्छा बजा रहे थे|
गाडी में बाई-शेठ बता रहे थे की, इरान में जब जब पारसी लोगो को मुस्लिमो की ओर से निकाला गया तो वे भारत में आ के उन्होंने अपने सामाज के लोगो को स्थापित किया| पहली बार उनका पैर गुजरात के संजान गाव को छुआ था| उसके बाद उदवडा, वापी, सूरत इन जगह में बिखर गए| शेठ आगे बता रहे थे की, उदवडा इस गाव का नाम पहले ऊंटवडा था क्योंकि उस गाव में जाड़ेराणा नाम के राजा के ऊंट हुआ करते थे| उन दिनों में तो जाडेराणा तो संजान गाव के राजा थे|
वे कह रहे थे की संजान गाव में उनके कुछ भाइयो ने एक बहुत बड़ी सी कैप्सूल बनाई है जिसमे उनको जो भी धर्म, क्रियाकर्म, ऐतिहासिक वास्तु, तस्वीरे इत्यादि चीजो को कैप्सूल में भर दिया है| कैप्सूल को जमीन के अंदर गाडा गया है और उसके उपर स्तंभ भी बनाया है| ताकि यह दुनिया जब पूरी तरह से नष्ट हो जाए और दूसरी पीढ़ी जब आएगी तो उत्खनन के द्वारा उन्हें पता चले की इससे पहले कौन लोग रहते थे|
पारसियों के धर्मगुरु ने जाडेराणा के साथ बातचीत की| वो इस तरह से थी की जाडेराणा ने दूध से भरा हुआ गिलास धर्मगुरु को दिया यह बताने के लिए की, “हमारी प्रजा यहाँ पर है जो अधिकतर भरी हुई है तो उसमे आपके लोग ना समा पायेगे, तो इसका जवाब धर्मगुरु ने दूध के गिलास में शक्कर डाली और जाडेराणा को पिने दिया उसका मतलब यह था की आपके स्थान को में हमारे लोगो की मीठास भर देगे| फिर इस तरह से पारसी लोगो को संजान से लेकर सूरत, फिर मुंबई तक वे बढ़ गए| जाड़ेराणा के नियम के अनुसार उनकी कई शर्ते पारसियों को माननी पड़ी| हिंदुओ में शादी दिन में की जाती है इसलिए इन्हें यह नियम दिया की वे रात को शादी का वक़्त रखे|
शाम के वक्त हम उद्वाड़ा स्टेशन आ पहुचे| छोटा सा स्टेशन है| स्टेशन से ६ किलोमीटर की दुरी पर गाव था| गाव में पहुचने के लिए रिक्शावाले को WZO कहते है ताकि वो निश्चित जगह पहुचा पाए| WZO याने की WORLD ZOROASTRIAN ORGANISATION. यह संस्था उदवाडा के रतनाशाहां के प्रॉपर्टी का सही इस्तेमाल होने की वजह से कुछ पारसियों ने मिलकर बनाई है|
कहा जाता है की, पुराने लोग यह मानते थे की गाव स्टेशन से हमेशा दूर ही रखते है वो इसलिए की वो नहीं चाहते की उसका शहर बने| लेकिन तब पर भी अब गाव में केमिस्ट का दूकान बना है| उसके अलावा एक्सिस बैंक का एटीएम भी खुल रहा है| घर के पास ही एक बहुत सा सुंदर सा समुन्दर है| बाई बता रही थी की पहले यह समुद्र काफी स्वच्छ था लेकिन कई लोग यहाँ पर बाहर छुट्टी मनाने आते है इसलिए इसमें काफी गंदगी हुई है| बाई ने मुझे शुक्र का चमकता हुआ तारा दिखाया, जो बहुत ही खुबसूरत है| कह रही थी की शुक्र का तारा आकाश में रातको पहले आता है उसके बाद अन्य तारो का आगमन होता है| मैंने समुद्र की तस्वीरे भी खिची|
जब पूरी पारसी प्रजा गुजरात में आ पहुचे तो उनके अग्नि-दैवत को भी लाया गया| उद्वाड़ा पहला पारसियों का मंदिर स्थापित हुआ जिसका नाम है “इरानशाहा” यह अग्यारी से भी बड़ा मंदिर है|जिसमे  इरान के अग्नि-दैवत को उदवाडा में स्थापित किया इसलिए उस पहले अग्नि के मंदिर (अग्यारी) को इरानशाहा कहते है| फिर उस ही अग्नि के दिये को अन्य जगह में लाया गया जिसे “अग्यारी” कहते है| इस अग्नि को पवित्र माना जाता है| अग्नि की पूजा उनके धर्मगुरु के द्वारा अग्यारी में की जाती है| पारसी के अलावा अन्य जाती के लोग अग्यारी में आने को मना किये जाते है| क्योंकि इस धर्म में प्रवेश करने के लिए उन सारी विधियों से जाना होता है ताकि अग्यारी में प्रवेश करने के काबिल हो सके|

शेठ उनके बचपन की कुछ यादे बता रहे थे की वे एकदिन सिगरेट पिने का ढोंग उनके पिताजी के सामने कर रहे थे उनके पिताजी ने उन्हें बहुत पिटा वो इसलिए क्योंकि अग्नि के साथ मजाक नहीं किया जाता और उसे खिलोने की तरह खेला नहीं जाता| इससे पता चलता है की आग का महत्व उन लोगो के लिए कितना है|
पारसी लोग काफी शांति से रहना पसंद करते उसके साथ-साथ जिदंगी को बेहतर कैसे बनाया जाये इसपर काफी विचार करते है लेकिन यह विचार इतना आगे तक ले जाता है की कई लोग शादीया ही नहीं करते| इस वजह से इनकी संख्या काफी कम होती जा रही है| कई लोग उनके धर्म के रीतिरिवाजो से भागते है इसलिए पारसी पंचायत ने स्कूल भी निकाली है जहापर बच्चे को धर्म की शिक्षा और उसके साथ औपचारिक शिक्षा भी ले| ताकि बच्चे को सात साल के धर्म की शिक्षा लेते हुए वे अपनी प्राइमरी, अपर-प्राइमरी और हाई स्कूल के शिक्षा से भी वंचित ना हो| और ऐसे बच्चो को स्कूल से पैसे दिए जाते है| अगर बच्चा पहले नम्बर पर हो तो उसे महीना तीन हजार, दूसरा हो तो पाच हजार और तीसरा बच्चा हो तो पंधरा हजार की रकम दि जाती है| ताकि वे धर्म की सीख और उसका वारसा आगे तक ले जाए|    
घर तो देखा जाए तो बंगले है जो काफी बड़े है| साग, बबुल के पेड़ से घर बने है| नारियल, आम, ताड़, अनार के पेड है| कहाँ जाता है की वे लोग ताड़ की ताड़ी बनाते हुए बेचते थे| उसी के साथ – साथ वे पापड, भाकरा भी बनाते थे और उसे बेचते थे| उदवाडा के पापड प्रसिद्ध है| लेकिन अब इन पापड़ बनाने के आ काम वहा के अन्य समाज के लोग करते है| कईयो के घर के आँगन में कुआ भी है, उन दिनों पानी की सुविधा सरकार की और से नहीं होती थी इसलिए उन्होंने अपने कुए बना लिए, मैंने एक कुए में कछुए को भी देखा वो इसलिए होता है क्योंकि वो पाणी को साफ़ रख पाए|
उनके उदवाडा के घर को काफी पवित्र माना जाता है उसके साथ अगर कोई महिला को महावारी आ जाए तो वो उस घर में रूक ही नहीं सकती| उसे तुरंत उस घर को छोड़ना होता है| ऐसे कहा जाता है की उन घर के महिलाओं को जब महावारी आती थी तो उन्हें अलग कमरे में रखा जाता था आज भी वो कमरा है| उसे जमीन पर ही सोने के लिए देते थे, वो किसी भी चीज को हाथ लगाने के बंधिश थी| महावारी आने के पहले पाच दिन और आ जाने के बाद के पाच दिन तक उसे अलग सा रखा जाता था| फिर उसे सिर से पाँव तक के स्नान के बाद ही वो घर में घूम पाती थी|
पारसियों में भी उनकी अन्य जनजाति है जैसे दस्तूर, ब्राह्मिण| वे लोग होते है जो उनके क्रिया-कर्म का उनका काम करते है जैसे श्राद्ध के लिए जो खाने का नैवेद्य दिखाते है उसे बनाने का मान सिर्फ उन्हें ही मिलता है| उसको अन्य पारसी के लोग नहीं बना सकते है| बनाते वक्त वे काफी चीजो का ध्यान रखते है| नैवेद्य बनाते वक्त जो पारसी लोग नहीं है उन्हें किचन में आने की इजाजत नहीं होती| खाना बनाने से पहले उपर से नीचे तक नहाते-धोते है, पुराने कपडो को छूते तक नहीं| फिर नैवद्य बनाते वक्त घर  में किसी भी वस्तु को नहीं छुआ जाता जैसे की चूल्हे को भी नहीं छुआ जाता है| सिर्फ बरतन और खाने की सामग्री को छुते है| वैसे तो बाई और शेठ तो नैवेद्य लोगो को मुफ्त में बनाकर देते है|

शेठ कह रहे थे की, अच्छे काम और बुरा काम को स्वर्ग या नरक में समान तरीके से देखा जाता है| जैसे की जितना मैंने अच्छा काम किये हो उसका रिवॉर्ड उतना ही मिलेगा और जितने बुरे काम धरती पे किये हो उसकी शिक्षा भी उतनी ही मिलती है|
शेठ ने उनके हाथो ने अपने हाथो से पत्थर, शिपले की मदद से निर्जीव जानवर बनाए है जैसे हाथी, कछुआ जो काफी सुंदर तरीके से बनाए है| उन दोनों पती-पत्नी में सिखने करने की ललक काफी है| वे दोनों हमेशा कुछ ना कुछ पढ़ते-देखते रहते है और उसके बारे में जानकारी मुझे देते है| आज उनकी ही वजह से में उस गाव में जा पाई| बाई कह रही थी की इस गाव में आने के लिए नसीब होना चाहिए और यह मौक़ा मुझे मिल गया|  

Friday, 4 October 2013

दिवस वटपोर्णिमेचे.........................

आज वटपोर्णिमा, म्हणजे स्त्रीयांचा दिवस ज्यात महिला, उपवास करतात, वडाच्या झाडाची पूजा करता व सात जन्मी हाच नवरा असावा अशी आशा ठेवतात, आज एका बाईशी बोलने झाले ती गेले १० वर्षापासून वटपोर्णिमा साजरा करते, व् तिला हाच पति असावा असे तिला वाटते, कारण नवरा तिच्यासोबत चांगला वागतो.

ज्या स्त्रियाचा पति तिच्या गरजा, मुलांचे संगोपन, परिवाराला बघणे तसेच स्वत:बद्दल ही काहीतरी चागले करण्याचा विचारात असने इत्यादि गोष्टी करीत नाही तर टी स्त्री तर कधीच असे म्हननार नहीं की हां पति सात जन्मी असावा.

माझा पहिला प्रश्न असा की का सात जन्म येणार का, कारण निसर्ग किंवा देवाच्या नियमानुसार उत्पत्ति आणि नाश ही गोष्ट होणारच, पण त्यात काय भरोसा तीच व्यक्ति, पशु-प्राणी पुन्हा एकदा जन्मास येइल? कारण मी अजुन तरी कोना व्यक्तीचा पूर्ण-जन्म पहिला नाही, म्हणून ह्या स्त्रियांची इच्छा पूर्ण होणार की नाही यात शंका आहे,


दूसरा प्रश्न असा येतो की एकाच व्यक्ति सोबत का प्रत्येक स्त्रीला रहायला आवडेल? सगळ्या तर तसेच विचार करत असतील का? का पुरुषांना पण असे वाटत असेल का की हीच पत्नी असावी कारण ते सुद्धा बहुतेक तिला वैतागलेले असावेत?

तीसरा प्रश्न असा की पुरुष का नाही उपवास करीत किंवा वडाची पूजा करीत नाही? बहुतेक समाजाने तो अधिकार दिला नसावा, म्हणून इच्छा असुनही पुरुष करीत नसावे, बहुतेक काही पुरुष उपवास करीत असेल की हीच बायको आपणास लाभावी जन्मो-जन्मी. पण किती विचित्र असेल जर पुरुष वडाच्या झाडाची पूजा करतो, कल्पना केल्यावरही ही किती विचित्र वाटते.

मात्र हा सण मला फार आवडतो, कारण सगळया स्त्रिया सकाळी उठून अगदी छान तैयार होतात, वडाची पूजा करतात, ह्या दिवशी वडाला खरच किती मान असतो त्यास ही बरे वाटत असेल. मी लहान होते तेव्हा आमच्या बाजुच्या घरातील मामी मला काळ्या मन्यांच्या माळा बनविण्यास बोलवित असे कारण पूजा झाल्यानंतर त्या स्त्रीयाना घालण्यास सांगत असे, तर त्या  माळेबद्दल खुप आकर्षण असे, मला असे वाटे की मी पण घालू पण घालू शकत नाही कारण कुवारी आहे, तरिसुध्हा एका महिलेकडून मी मागुन घेतले व हातात ब्रेसेलेट म्हणून हातात घातले, चांगले वाटते.

काही वर्षानंतर हां सन तर दिसानारच नाही कारण सण साजरे करने आजच्या नोकरदार महिलेला जमण कठिन आहे, तरीसुद्धा ज्याना खुपच आवड असेल तर त्या नक्कीच करतील अगदी कामाला दांडी मारून! 


   

Sunday, 15 September 2013

TISS के स्टूडेंट्स और गणपति का त्यौहार

कल का दिन था ५ वे दिन के गणपती अनंत चतुर्थी| हमारे कॉलेज में भी स्टाफ कॅाटर्स के लोगो ने भी गणपती बिठाया था| उन्होंने सिर्फ ५ ही दिन बिठाया| शाम को गणपति जाने का समय था| टीस के स्टूडेंट्स अपनी पुरे दिन के लेक्चर को अटेंड करके बाकी का समय assignment, research को पूरा करने के लिए देते है|

लेकिन उसी ही दिन कॉलेज का गणपती भी निकल रहा था| थोडीही देर में टिस का माहोल फटाके और ढोल-ताशेरे के साथ मिल गया था| वहा पर सिर्फ ढोल की गुंज सुनाई दे रही थी, पढाई थोड़ी देर के लिए इस शोर ने ले ली थी| लायब्ररी में बैठे हुए स्टूडेंट्स थोड़ी देर के लिए बाहर आये थे, कोई खिड़की से झाक रहे थे| पैर, हाथ, गर्द हिलने लगी थी| चेहरे पर मुस्कुराहट, ख़ुशी के भाव थे|

कुछ बच्चो ने ढोल के शोर के साथ अपने आप को मिला दिया याने की खुद ही नाचने लगे थे| जैसे कहते थे है बेगानी के शादी में अब्दुला दिवाना! लड़के-लडकिया अपने आप को पढाई से हटाकर कुछ देर के लिए नाचने में गुम हुए थे| अपनी दिनभर की थकान को मिटा रहे थे|

बजाने वालो को भी काफी जोर था बजाने के लिए| स्टूडेंट्स एकदूसरे को प्रेरित कर रहे थे की वो भी नाचे| कुछ लोग तस्वीरे खीच रहे थे|

आने वाले समय में कॉलेज में महा-सत्यनारायण पूजा होनेवाली है| इससे दिखाई देता है की अपने भारतीय संस्कृति बढ़ावा दे रहे है| इससे और एक बात है की जो बच्चे अपना घर, लोग छोडके पढ़ने आये है उन्हें भी अपने यह त्यौहार मनाने के लिए मौक़ा मिला| जिससे एकदूसरे के प्रति प्यार, संस्कृति को साझा करने के लिए यह वक़्त अच्छा रहा है|

Monday, 9 September 2013

रिश्तो की समस्या और औरते......................


याद है मुझे मै चुरू में गई थी शादी में. एक ही घर में चार शादिया होनेवाली थी, उसमे दो भाई और दो बहनों की शादी थी| पहले दिन बहनों की शादी थी, और दुसरे दिन भाईयो की. लेकिन भाइयो की शादी देख नहीं पाए, क्योंकि औरते लड़की के घर नहीं जाते|

दुल्हन घर आने के बाद, उन दोनों को घर में बिठाया गया| उनका घुंघट ओठोसे भी निचे था| हर कोई झाककर देख रहे थे| उसे मुह-दिखाई कहते थे| इतना क्या छुपा था उस मुह में की छुपाके रखा गया था|

बहुत बार लड़की की शादी होती है, उसे तो लड़के के घर जाना होता है? मेरा सवाल यह है की लड़का क्यों नहीं जाता? लेकिन गया तो भी उसे घर-जमाई कहा जाता है| इसलिए यह होना संभव नहीं है| लेकिन कई घरोमे मैने देखा है की वो लडकिया १०-१० साल तक वे अपने मा-बाप के घर नहीं जाती थी, वे हमेशा अपने ससुराल के लोगो के साथ ही संपर्क में रहती है|

भारत देश में हर तरफ रीतिरिवाज अलग तरह के है| शादिया भी अलग-अलग जगह में अपने तरीके से होती है|  कोई शादिया अपने ही मामा के लड़के या लडकी साथ होती है तो कई शादिया ऐसी होती की अपने ही मामा के साथ कर देते है| इस तरह के रिश्ते सुनते ही मन में अलग विचार शुरू हो जाते है की ऐसा कैसा हो सकता है? लेकिन जो रीतीया बरसो से चली आ रही है उसे वे लोग कैसे नकार सकते है| उनके लिए तो बहुत सामन्य बात है|

इस तरह के रिश्तो में लोगो का विरोध उतना ही जोरदार होता है| जैसे की खाप पंचायत की बात करे तो एक ही गाव में लोगो ने शादी की और गाव के ही लोगो के विरोध दर्शाते हुए उनकी हत्या भी की|

मैंने अभी ही सुना था, की बाप ने अपने लडकी से शादी की और उन्हें अभी बच्चे भी है| तो इस तरह के रिश्तो को देखते हुए लगता है की रिश्ते नाम की चीज है ही नहीं, उन्हें तो समाज में शांति प्रस्थापित रहने के लिए बनाये है| हकीकत में तो इसके कोई मायने नही है| तो क्यों इतने रिश्तो में उलझो?

जब विरोध दर्शाने की बात आती है तो लगता है की सारी उलझन सेक्स को देखते हुए होती है जो लोगो के लिए इस तरह के रिश्तो में अपवित्र है| क्योंकि सेक्स तो उस ही व्यक्ति के साथ हो सकता है जो जिससे तुम शादी करते हो और उसके साथ पहले कोई भी रिश्ता ना हो| लेकीन जो रिश्ता है जैसे बाप-बेटी, लड़की-लड़की (दोस्त), मा-बेटा इत्यादी रिश्तो में यौवन सबंध हो ही नहीं सकता? तो इस तरह के रिश्ते बन जाते है तो उसे अपनाने के लिए तो कई सदियो का इन्तेजार करना पड़ेगा|



Saturday, 7 September 2013

तामझाम और उसमे फसी हुई औरते

पिछले दो दिनों से हमारे यहाँ शादी का माहोल चल रहा है, वैसे तो शादी है गुजराती के घर की, उन्हें हमारे यहाँ के लोग “छैया” कहते है| जिस घर में शादी हो रही है, वे सिर्फ हमारे बगल के घर मे रहते है, मतलब उनके घर की दिवार और हमारे घर की दिवार एक ही है| घर के सामने मैदान में मंडप सजाया हुआ है, जहा पर रातको औरते गुजराती में गाने गाते है और उस गानो में तो बहुत सारी गालिया दी जाती है और वो भी दुल्हे की माँ, पिता, भाई, देवरानी या जेठानी के नाम लेते हुए| उसमे लोग मजे लेते है|
आज तो पार्टी थी, वैसे तो शादी कल है | आज दुल्हे की मा और सारे घर वाले उसके भाई के घर जाते है, वहां पर भाई याने दुल्हे का मामा, बहुत सारे सोने के जेवर, कुछ घरेलु सामान, कपडे देते है| इस गतिविधि को, “मामेरू” कहते है| मैंने सुना की कोई लोग तो २० लाख तक का सामान देते है| पता नहीं इनको कितने रुपयोंका मिला|  उसी के साथ रातको DJ है | इसमें तो आधी chawl के लोग नाचने तथा देखने आयेंगे | मेरी दोस्त आरती इस DJ को “चाँदनी बार” कहती है | देखो अभी तो कुछ देर के बाद मेरा घर तो हिलने वाला होगा | लोगोंको नाचते हुए देखने में तो मजा आएगा क्योंकि हर कोई अपने ढंग से नाचता है| आज तो बहुत सारी दारू, बियर पि ली जाएगी| और फिर कल लोग इसी जोश में शादी में जाने के लिए तैयार हो जायेगे |
इन लोगोंको के समाज में भी एक बात दिखाई देती है की, वे लडकियोंकी शादी जल्दी करवा देते है| क्योंकि उन्हें डर होता है, की कई हमारी लडकिया किसी के साथ भाग ना जाये, और दूसरी बात यही की सारे लोग सोचते है की लड्कियोकी शादी जल्दी करवानी चाहिए और एक बात देखि की इनके लड्कियो के किसी के साथ सबंध देखे तो वे तुरंत ही उसी या किसी अन्य लड़के से शादी करवा देते है|  हमारे chawl में एक लड़की को एक लड़के से प्यार था| वे दोनों भी गुजराती ही है और एक ही चाली में रहते है मतलब दोनों का घर एक दुसरे के सामने ही है| तो उनके दोनों परिवार ने दोनों के शादी का निर्णय ले लिया अभी शादी को कुछ ५ से ६ साल ही हुए होगे, उन्हें एक ३ से ४ साल की बेटी भी है| मनीषा अब शरीर से एकदम दुबली – पतली है| ऐसा लगता है की वो बहुत बीमार है | और मुह से लगता है की वो खुश नहीं है जैसे के मैंने उसे शादी से पहले देखा था| शादी से पहले वो बहुत खूबसरत लगती थी, आज वो खूबसूरती उसमे दिखती ही नहीं|
वैसे तो मेरे अबतक का शादी-शुदा औरतो के लिए अनुमान यही रहा है, की वे शादी के पहले से जो अपनी ख़ुशी वाली जिन्दगी जी रही थी, शादी के बाद जिन्दगी बहुत उदासी से भरी हुई, दुःख-दर्द, परेशानी, बहुत सारे जबाबदारी से उलझे हुए इत्यादी | पता नहीं शादी में ऐसा क्या है की, शादी के तुरंत बाद इतना बड़ा फर्क गिर जाता है, और यह फर्क मैंने ज्यादा करके शरीर ओर मन को देखते हुए महसूस किया हुआ है| अगर यह तकलीफ़ उनकी साथ वाली औरतों को बताये तो वो अपने साथ क्या हुआ उस बात को बोलने के लिए कुछ दिन के बाद भूल जाती है, और सिर्फ वे अपने पति, ननंद, सास, पिता, जेठ, देवारानी-जेठानि और उनके बच्चे के भी बारे में ही बाते करती है, जैसे उसने ये किया, ऐसे किया, उसका व्यवहार ऐसा है इत्यादि | शायद वो कहिना कही वो अपने दर्द को उसी बातों से कम करती हो | बड़ी अजीब सी है यह औरतों की जिंदगी | तब पर भी इतने सारी दुखों में कैसे भी करके जी लेती है | 







एक पुरानी नौकरानी की यादे..................


अभी फिर से मैंने नौकरानी के डायरी को पढ़ना शुरू कर दिया| अब पढ़ते वक्त याद आया की मै भी कुछ दिनों के लिए किसी के घर नौकरानी थी| इसी शानो की तरह, मुझे भी उन सारी घर मालकिनो के लिए गुस्सा आता था | क्योंकि वो होती ही है वैसी| बहुत काम देने वाली| पैसे तो कम ही देती है, लेकिन काम इतना की, अपना घर का भी इतना ना हो| जिस घर में मैंने काम किया था, तब मै शायद ही १२ वी पढ़ती होगी| और उसके पहले भी एकदम बचपन में याने ५वी या ६ ठी में होगी तब माँ काम करती थी, और मै भी बरतन माचती थी | लेकिन जब मै माँ के साथ एक गुजराती के घर काम करती थी, तब वहा पर एक बूढी औरत थी, खाने पिने की लिए हमेशा आगे रहती थी| मैने उसके एक खाने की स्टाइल देखी  वो रोज एक ही सब्जी खाती थी, जैसे लौकी की सब्जी, रोटी जैसे हमारा मुकेश बनाता है, तो उस बूढी ने मुझे भी सिखाया था| तो यही उसका रोज का खाना होता था| खाना खाने के बाद, वह जब हाथ प्लेट में धोती थी, तब वह हाथ धुला हुआ पानी पी लेती थी| बड़ा अजीब था उसका हाल| मै सोचती थी यह बूढी कितना बचाती है | माँ तो बहुत ही हसती थी | उन घरो में काम करना वैसे तो मुझे अच्छा लगता है लेकिन एक ही बातकी दिक्कत होती थी की, उनके घर बड़े होते थे इस वजह से यह होता था की, पोछा तथा झाड़ू लगाने में बहुत समय और मेहनत होती थी| और थकान तो पूछो मत| और भूख भी बड़ी तेजी से लगती थी|
मैंने माँ के पास से भी घरो के किस्से सुने है| एक घर वो काम करती थी उसे “चीनीवाला” नाम से पुकारती थी| क्योंकि उनका लास्ट नेम ही चिनिवाला था| जैसे एक घर मै वो काम करती थी, तो उसे पता था की सेठ और सेठानी के बिच में झगड़े थे, उनकी एक बेटी थी| जो बहुत खुबसूरत थी| जब वे दोनो घर पर नहीं होते थे तो वो कई लड़के दोस्तों को घर पर बुलाती थी| एक दिन तो उसने मुझे पास में बुलाकर कुछ कपडे और गहने पहनवाए जिसमे में खुबसूरत दिख रही थी|
हमारे यहाँ के कई पडोसी औरते घरकाम पारसीयोंके घरो में करती है| उन्हें वे नाम कंजूस देती है| क्योंकि वे कभी भी अपने नौकरानीयोंको कुछ नहीं देती, और उसमे भी पगार तो सबसे कम| तो यह औरते उन्ही बहुत सारे गालिया बकती है|
कुछ औरतोने तो काफी साल काम किया| तो वह मालकिने उनके समस्या में काम आती है| एक मालकिन ने तो एक नौकरानी के बच्चे के शादी के लिए पैसे तक दिए थे जिसे उन्हें लौटाने नहीं थे| जैसे की हमारे ही घर का उदहारण  है की, मेरी दादी, ने एक सेठानी के घर ४० साल तक काम किया| और जब दादी ने उसका काम छोड़ दिया तो उसके आगे के ज़िन्दगी के लिए हर महिना पैसे भी भेजती रही याने के दादी आखरी सास तक| एक दिन तो वह सेठानी तो खुद दादी को मिलने मुम्बई से पूना तक चली गई | जब की वह भी बूढी है|
तो इस तरह की यह बड़े लोगोंकी कहानिया है जिनमे से कुछ देवता निकलते है जो मरते दम तक साथ देते है| तो कुछ बहुत बुरे जिन्हें उनके नौकरानियो का कुछ लेना देना नहीं| उन्हें बस काम से मतलब है| 


औरते काफी सहनशील होती है.......................................


वे जो भी अपने जिंदगी में करती है तो उसे वो दस बार सोचती है| की मेरे पति, पिता, बच्चे और पूरा परिवार को अच्छा लगेगा की नहीं और उसके साथ – साथ उसे इस समाज का भी डर तथा शर्म होती है की यह समाज क्या बोलेगा| तो इस लिए जिंदगी की इच्छा पूरी कर नहीं पाती| उस प्रक्रिया में उसे उस बातोका महत्व ही नहीं होता है की, खुद की इच्छा, आकांशाये, और जो जरुरी होता है तो वे सारी बातोंको कुछ पल में ही मार देती है| उसे धीरे – धीरे ऐसे लगने लगता है की, मुझे इस तरह से रहना है जैसे, “अगर में खाना नहीं बनाउंगी तो इनका क्या होगा? अगर एक दिन बाहर खाना खा लिया तो क्या हो सकता है| (यह बाहर खाने की बात गरीब लोगोंके घर में तो कर ही नहीं सकते)

जब लडकियोंको पढ़ाया नहीं जाता क्योंकि, उन्हें घर पर काम होता है| क्योंकि उसके बिना घर चल ही नहीं सकता, तो प्रश्न यहा पर यह आता है की, जिनके घरोमे लडकिया नहीं होती तो उनके घर में काम कौन करता है? तो उनके घरमे तो वही औरत जो शादी करके आइ है, और तब तक काम करेगी जब तक वह बूढी नहीं हो जाती या फिर उसके बेटोंकी शादी नहीं होती|

उनमे तो स्वीकार वुत्ती उतनी ही स्ट्रोंग होती है जितनी  वे सहनशील है| मै यह बोलके औरतोको और दबा रही हु| पर में नहीं ऐसा कर रही हु क्योंकि, यह दो बाते उसके पास जन्म से लेकर ही है| जैसे की उसका प्रसूति काल, महावारी के दिन, भारी गहने तथा पोशाख जो वो शुरुवात से पहनते हुए आ रही  है,(पर अभी यह औरते नहीं करती अगर करती भी है तो फैशन के नाम से), समाज के बंदिस्त में जैसे, उचे आवाज से बात न करना, बडोंके पैर छूना, घर का काम उसके नाम, इत्यादी बाते महिलाओने अपने जिन्दगी में स्वीकारा है|

अब साल २०१३, जो है उन युवा पीढ़ी का जो सारे बंदिशोंसे पार हो के स्वतंत्रता के शिखर को छूने की कोशीश तथा उसे हर दिन जी रहे है| अगर वो उन्हें ना मिले तो काफी परेशान होते है| क्योंकि उन्हें ऐसे लगता है की, उनकी स्वतंत्रता छिनी जा रही है और फिर वो उसमे परेशान होते है, उन्हें काफी दर्द होता है| लेकिन फिर वे जागृति में आते है और फिर एक बार अपने जिंदगी को नए सिरे से देखकर फिर से उसकी शुरुवात करते है| क्योंकि उसमे एक आशा, उल्हास होता है की मुझे जीना ही है|